इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सेना भर्ती अधिकारी लखनऊ को पूर्व सैनिक के दत्तक पुत्र को गोदनामा पंजीकृत नहीं होने के बावजूद वरीयता देते हुए प्रशिक्षण पर भेजने के संबंध में विचार कर निर्णय लेने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि सेना में सूबेदार रहे राम बहादुर पाल ने हलफनामा देकर दत्तक पुत्र को वरीयता देने और प्रशिक्षण पर भेजने का अनुरोध किया है। जिस पर अन्य साक्ष्यों के साथ विचार किया जाए। एकल पीठ ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि याची की वरीयता देने की अर्जी सेना द्वारा निरस्त होने के बाद गोदनामा पंजीकृत किया गया है।
खंडपीठ ने इस आदेश को सही नहीं माना और कहा कि जब पूर्व सैनिक ने हलफनामा देकर 2001 में गोदनामा बताते हुए दत्तक पुत्र को वरीयता देने की मांग की थी तो उसे साक्ष्य के रूप में लेना चाहिए था। गोदनामे के बाद में पंजीकृत होने का कोई सरोकार नहीं है। यह आदेश मुख्य न्यायाधीश गोविन्द माथुर तथा न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा की खंडपीठ ने हरनामू पाल की विशेष अपील को निस्तारित करते हुए दिया है।
याची ने गोद लेने वाले पिता का हलफनामा देकर नियुक्ति में वरीयता देने व प्रशिक्षण पर भेजने की अर्जी दी। उसकी अर्जी निरस्त कर दी गई तो हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। कोर्ट ने कहा कि अर्जी नौ जुलाई 18 को निरस्त कर दी गई और 2001 के गोदनामे का चार फरवरी 19 को पंजीकरण कराया गया। इस आधार पर एकलपीठ ने याचिका खारिज कर दी। खंडपीठ ने एकल पीठ के आदेश को रद्द करते हुए पिता के हलफनामे को साक्ष्य के रूप में विचार कर निर्णय लेने का निर्देश दिया है।