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Nithari Kand: निठारी कांड में सीबीआई ने सबूत तक न जुटाए, कोर्ट ने कहा- विवेचना के तौर तरीकों से बेहद निराशा

Tue, 17 Oct 2023 11:43 AM IST
शाहरुख खान अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

Nithari Case News: इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने कहा है कि निठारी कांड में हुई हत्याओं के पीछे अंग व्यापार जैसे उद्देश्य हो सकते थे, लेकिन सीबीआई ने इस पर गौर ही नहीं किया। वो भी तब, जबकि घटनास्थल के पास ही रहने वाला एक डॉक्टर किडनी कांड में पहले गिरफ्तार किया गया था। इतना सबकुछ होने के बाद भी सीबीआई के इस दिशा में जांच नहीं करने पर कोर्ट ने हैरानी जताई।
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Nithari Case - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निठारी कांड से सुरेंद्र कोली और मोनिंदर सिंह पंढेर को बरी करते हुए जांच एजेंसी सीबीआई की कार्यशैली पर गंभीर सवाल किए हैं। 308 पेज के आदेश में कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, जांच एजेंसियों ने विवेचना के बुनियादी सिद्धांतों का भी ख्याल नहीं रखा। 
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जांच एजेंसी के विवेचना के तौर-तरीके इतने खराब हैं कि हमें बेहद निराशा हो रही है। सबूत तक नहीं जुटाए गए। न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एसएएच रिजवी ने कहा कि घटनास्थल के बगल में स्थित मकान में मानव अंग व्यापार का संगठित गिरोह भी पकड़ा जा सकता था, लेकिन उस ओर दिमाग नहीं लगाया गया।

कोली की उस अर्जी में दम था, लेकिन सीबीआई की जांच बेपरवाही से जरूरी सावधानियों के बिना की गई। यूपी पुलिस के जांच अधिकारी ने जो सुझाया, सीबीआई उसी आसान रास्ते पर आगे बढ़ी। अभियोजन का मामला आरोपी कोली के 29 दिसंबर, 2006 को पुलिस के समक्ष दिए गए कबूलनामे पर आधारित है। 
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आरोपी कोली के खुलासे, जिसमें खोपड़ी, हड्डियों, कंकाल की बरामदगी को दर्ज करने के लिए जो प्रक्रिया अपनाने की जरूरत थी, उसे पूरा नहीं किया गया।
 

60 दिन कस्टडी में रखा, दोष स्वीकृति के बयान करवाया 
9 जनवरी 2007 को निठारी हत्याकांड की जांच सीबीआई को सौंपी थी, जिसने दो ही दिन बाद सारी जांच अपने हाथ में ले ली, एफआईआर भी फिर से लिखी। हाईकोर्ट ने कहा कि कोली को 29 दिसंबर 2006 को गिरफ्तार किया था। अगले लगातार 60 दिन उसे यूपी पुलिस और फिर सीबीआई ने हिरासत में रखा। मार्च 2007 को उसने इकबालिया बयान दिया। एक सातवीं तक पढ़े आरोपी का यह बयान शक जताने वाली परिस्थितियों में आया। 

हाईकोर्ट का सवाल-16 हत्याएं करते हुए कभी विफल नहीं हुआ?
कोली के बयान के अनुसार, 16 हत्याएं करने के दौरान कोली किसी 'स्वचालित अवस्था' में पहुंच जाता था, वह पीड़ितों को ललचाता, घर में लाता, हत्या करता, सेक्स करता, शरीर के टुकड़े करता, उन्हें पकाता व खाता, अवशेष बैग में भरता, नाली में भी बहाता। लेकिन इन 16 घटनाओं के दौरान किसी ने घर का दरवाजा नहीं खटखटाया, यह सब बेहद अजीब लगता है। इन 16 घटनाओं में वह एक बार भी विफल नहीं हुआ। यह 100 प्रतिशत सफलता पूरी तरह मानने योग्य नहीं लगती। आरोपी के बयान के अनुसार वह बंगला संख्या डी5 में हत्याएं करता था। यहां फॉरेंसिक जांच में खून के कोई निशान नहीं मिले।

इस केस में जेल में रहेगा सुरेंद्र कोली
कोली, पंढेर को 13 फरवरी, 2009 को गाजियाबाद सीबीआई कोर्ट से फांसी की सजा हुई थी। हाईकोर्ट ने 11 जुलाई, 2009 को कोली की सजा कायम रखी लेकिन पंढेर को बरी किया था। सुप्रीम कोर्ट ने 15 फरवरी 2011 को सजा के खिलाफ कोली की अपील खारिज कर दी। इसके बाद दोनों की दया याचिका राष्ट्रपति ने खारिज की। 2015 में हाईकोर्ट ने कोली की मौत की सजा उम्रकैद में बदल दी। सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे कायम रखा। इसलिए उसे जेल में ही रहना होगा।
 

हत्याओं से कुल्हाड़ी का संबंध नहीं जोड़ पाई सीबीआई
बचाव पक्ष के वकीलों की दलील थी कि सिलसिलेवार हुई हत्याओं में प्रयुक्त हथियारों में चुन्नी, पोंछे वाले कपड़े और चाकू के साथ कुल्हाड़ी का प्रयोग भी दर्शाया गया, लेकिन सीबीआई हत्याओं का कुल्हाड़ी से सीधा रिश्ता जोड़ने में नाकाम रही। हाईकोर्ट ने अभियोजन से जब इसका जवाब मांगा तो वह निरुत्तर रहे। सोमवार को दिल दहला देने वाले निठारी कांड के दोषी सुरेंद्र कोली और उसके मालिक मोनिंदर सिंह पंढेर को हाईकोर्ट ने सभी मामलों से दोषमुक्त करार दिया।

फांसी के अमल पर सुप्रीम कोर्ट ने लगा रखी है रोक
गाजियाबाद स्थित सीबीआई कोर्ट ने सुरेंद्र कोली को एक दर्जन से अधिक मामले में फांसी की सजा सुनाई थी। हालांकि, फांसी की सजा के क्रियान्वयन पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा रखी है। फांसी की सजा के सभी आदेशों को कोली ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने कोली के वकील युग चौधरी व पयोशी रॉय, सिद्धार्थ शर्मा और मोनिंदर सिंह पंढेर की वकील मनीषा भंडारी की तारीफ की। कहा, निठारी कांड का मामला इतना भारी-भरकम था और इतने ज्यादा दस्तावेज थे कि यह अदालत भी अपने कर्तव्यों के निर्वहन में चूक कर सकती थी, लेकिन बचाव पक्ष के वकीलों ने कोर्ट को निष्पक्ष निर्णय तक पहुंचाने में मदद की।
 
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साल दर साल ऐसे होता रहा इंसाफ का इंतजार
29 दिसंबर 2006 को नोएडा में मोनिंदर सिंह पंढेर के घर के पीछे नाले से 19 बच्चों और महिलाओं के कंकाल मिले। मोनिंदर सिंह पंढेर और सुरेंद्र कोली गिरफ्तार।
8 फरवरी 2007 को कोली और पंढेर को 14 दिन की सीबीआई हिरासत में भेजा गया।
मई 2007 को सीबीआई ने पंढेर को अपनी चार्जशीट में अपहरण, दुष्कर्म और हत्या के मामले में आरोपमुक्त कर दिया। दो माह बाद कोर्ट की फटकार के बाद फिर सहअभियुक्त बनाया।
13 फरवरी 2009 को सीबीआई कोर्ट ने पंढेर और कोली को 15 वर्षीय किशोरी के अपहरण, दुष्कर्म और हत्या का दोषी करार देते हुए पहली बार फांसी की सजा सुनाई।
3 सितंबर 2014 को कोली के खिलाफ कोर्ट ने मौत का वारंट जारी किया।
4 सितंबर 2014 को कोली को गाजियाबाद की डासना जेल से फांसी देने के लिए मेरठ जेल ले जाया गया।
12 सितंबर 2014 को फांसी से पहले रात को ही वकीलों के समूह डेथ पेनल्टी लिटिगेशन ग्रुप्स ने कोली को मृत्युदंड देने पर पुनर्विचार याचिका दायर की। सुप्रीम कोर्ट ने मामले को इलाहाबाद हाईकोर्ट भेजा।
12 सितंबर 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने सुरेंद्र कोली की फांसी की सजा पर अक्तूबर 29 तक के लिए रोक लगाई।
28 अक्तूबर 2014 को सुरेंद्र कोली की फांसी पर सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्विचार याचिका को खारिज किया। 2014 में राष्ट्रपति ने भी दया याचिका रद्द कर दी।
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