परमात्मा के निरंतर जुड़ाव से हमारी सोच बदल जाती है। जिंदगी में रूहानियत के आते ही हमारी इंसानी सोच हमारे जीवन को सार्थक बना देती है। हमारे मन मेें करूणा, दया एवं सहनशीलता जैसी दैवीय भावनाओं का उदय हो जाता है। फिर, अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितियां हमारी मनोदशा को प्रभावित नहीं करतीं। शिकवा-शिकायत के भाव शुकराने में परिवर्तित हो जाते हैं।
सुदीक्षा माता ने कहा कि हम किसी यंत्र से प्रकाश की आशा तभी तक कर सकते हैं जब तक उसका संबंध बिजली से रहता है, ठीक उसी प्रकार परमात्मा से निरंतर जुड़ाव ही मानव जीवन की खुशहाली का कारण बनता है। हम समाज में फैली बुराइयों को अच्छाइयों में बदलकर एकत्व में सद्भाव का उदाहरण स्थापित कर सकते हैं। जब हम ब्रह्मज्ञान को कर्म रूप मेें उतार लेते हैं, तब आत्मा की मुक्ति संभव हो पाती है।
इनसे पहले निरंकारी रमित ने कहा कि संत एवं भक्तों का जीवन तो सदैव उत्सव वाला ही होता है, क्योंकि वह अपने सद्गुरु के प्रति भक्ति भाव से जीते हुए अपने जीवन का हर पल सुंदर बनाते हैं। प्रभु मिलन के लिए कोई खूबी या कोई विशेषता होना अनिवार्य नहीं, अपितु इसके लिए तो हृदय में श्रद्धा और विश्वास आवश्यक है।
परमात्मा को पाने का एकमात्र साधन सद्गुरु का सानिध्य ही है और इसकी जानकारी के लिए किसी धन या दौलत की आवश्यकता नहीं, अपितु परमात्मा को पाने की जिज्ञासा मात्र ही भक्त को इसका दीदार कराने में सहायक होती है। फिर उसका जीवन सहज बन जाता है। जिसमें वह हर कार्य को प्रभु की इच्छा समझकर सर्वोपरि मानता है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान भौतिकवादी युग में मानव को कभी न पूरी होने वाली इच्छाओं की व्याकुलता को त्यागकर सद्गुरु की शरण में जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त करना चाहिए। समागम में विभिन्न स्थानों से आए कलाकारों ने रूहानियत-इंसनियत संग संग विषयक भजनों की प्रस्तुति की। गीतों, विचारों, कविताओं को विविध भावों में व्यक्त किया गया। इस दौरान एक से बढ़कर एक गीत पेश किए गए।