कोर्ट ने कहा कि शारीरिक संबंध बनाने की मांग को लेकर पति-पत्नी के बीच पैदा हुई असहमति को दहेज उत्पीड़न नहीं कहा जा सकता है। अपनी शारीरिक यौन इच्छा को पूर्ण करने की मांग पति-पत्नी एक दूसरे से नहीं करेंगे तो कहां करेंगे।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दहेज उत्पीड़न के एक मामले में सुनवाई करते हुए पति के ऊपर दर्ज कराए गए उत्पीड़न की कार्रवाई को रद्द करने का आदेश जारी किया। कोर्ट ने कहा कि शारीरिक संबंध बनाने की मांग को लेकर पति-पत्नी के बीच पैदा हुई असहमति को दहेज उत्पीड़न नही माना जा सकता है। अपनी शारीरिक यौन इच्छा को पूर्ण करने की मांग पति-पत्नी एक दूसरे से नहीं करेंगे तो कहां करेंगे। पति द्वारा शारीरिक संबंध बनाने की मांग करना क्रूरता नहीं है।
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नोएडा की एक महिला के पति व अन्य के खिलाफ दहेज उत्पीड़न का मुकदमा दर्ज कराया था। आरोप लगाया गया था कि दहेज की मांग को लेकर पति मारता पीटता है और यातनाएं देता है। मांग पूरी न करने के कारण उसे मायके भेज दिया गया है। मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि यह मामला दहेज उत्पीड़न का नहीं बल्कि दोनों के बीच यौन संबंध बनाने को लेकर असहमति का विवाद है। इस मामले को दूसरा रूप देते हुए मनगढ़ंत तरीके से दहेज उत्पीड़न से जोड़ दिया गया है।
मामले में फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने कहा कि पति अपनी पत्नी और पत्नी अपने पति से यौन इच्छा की पूर्ति की मांग नहीं करेगा तो कहां करेगा। इसको शारीरिक क्रूरता या दहेज उत्पीड़न नहीं कहा जा सकता है। अदालत ने कहा कि पत्नी के शरीर पर मारपीट, यातना या उत्पीड़न के कोई निशान नहीं हैं। दहेज की मांग कब की गई और किस चीज की मांग की जा रही है इसका भी जिक्र मुकदमे में नहीं है। कोर्ट ने पति के खिलाफ दर्ज पूरा मामला रद्द कर दिया।