इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 319 के तहत विचारण न्यायालय को किसी सह अभियुक्त को सम्मन करने की असाधारण विवेकाधीन शक्ति प्राप्त है। जिसका इस्तेमाल सावधानी पूर्वक किया जाना चाहिए न कि यांत्रिक तरीके से।
कोर्ट ने कहा कि विचारण न्यायालय को यह शक्ति इसलिए दी गई है ताकि सभी आरोपियों का एक साथ विचारण हो और वास्तविक दोषी दंड पाने से बच न सके। यह कोर्ट का साक्ष्य पर आधारित विवेकाधिकार है। कोर्ट ने हत्या में शामिल होने के ठोस सबूत बगैर याची को धारा 319 की अर्जी पर तलब करने के आदेश को रद्द कर दिया है और कहा है कि अदालत ने गलती की है। साक्ष्य देखकर सम्मन करना चाहिए।
कोर्ट ने विचारण पूरा करने का निर्देश दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति वी सी दीक्षित ने मुरादाबाद के राहत अली की पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है। याचिका पर वरिष्ठ अधिवक्ता दया शंकर मिश्र व चंद्र केश मिश्र ने बहस की।