कोर्ट ने जताई चिंता
कोर्ट ने चिंता जताते हुए कहा कि हमारे सामने चिकित्सीय गर्भपात के लिए दाखिल होने वाली याचिकाओं में हमने पाया है कि ऐसे मामलों में सीएमओ, मेडिकल कॉलेज और मेडिकल बोर्ड के डॉक्टर को पीड़िता की जांच करते समय और उसके बाद मेडिकल गर्भपात के दौरान अपनाई जाने वाली प्रक्रिया के बारे में जानकारी नहीं है। जबकि, ऐसे मामलों में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया चिकित्सीय गर्भपात अधिनियम, 1971 में निर्धारित की गई।
मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी रूल्स, 2003 और मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी रेगुलेशन, 2003 के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों में भी इसका उल्लेख किया गया। पूरी प्रक्रिया में शामिल संवेदनशीलता को ध्यान में रखना होगा। इसलिए कोर्ट ने प्रमुख सचिव, चिकित्सा स्वास्थ्य और परिवार कल्याण को सभी सीएमओ को एसओपी जारी करने का निर्देश दिया।