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हाईकोर्ट का अहम फैसला, लोन वसूली में उत्तराधिकारी की गिरफ़्तारी गैरकानूनी

Wed, 29 May 2019 08:35 PM IST
विनोद सिंह न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
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चंडीगढ़ कोर्ट, हाईकोर्ट, अदालत, न्यायालय - फोटो : file photo
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि बैंक से लिए गए लोन की वसूली के लिए लोन लेने वाले के उत्तराधिकारी को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है। ऐसी गिरफ्तारी अवैध, मनमानी और अनुच्छेद 21 में मिले जीवन के अधिकार के विरुद्ध है। ऐसी गिरफ्तारी लोन वसूली के लिए निर्धारित प्रक्रिया के विपरीत है। किसी भी उत्तराधिकारी से वसूली की कार्यवाही उसे उत्तराधिकार में मिली संपत्ति से ही की जा सकती है। बैंक सिर्फ निर्धारित प्रक्रिया के तहत कोर्ट के माध्यम से वसूली की कार्यवाही कर सकते हैं। ऐसी वसूली देयता तिथि से तीन साल के भीतर ही हो सकती है।
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नियमानुसार महिलाओं, बच्चों, 65 वर्ष से अधिक उम्र के नागरिकों,सैनिकों और कानून में छूट प्राप्त लोगों की गिरफ्तारी लोन वसूली में नहीं हो सकती है। कोर्ट ने हमीरपुर के शिवनारायण की लोन वसूली में 14 दिन की गिरफ्तारी को अवैध करार देते हुए उसे मुआवजा देने का निर्देश दिया है। शिवनारायण की याचिका पर सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति एसपी केसरवानी ने  मुख्य सचिव को निर्देश दिया है कि वह सचिव स्तर के अधिकारी से रिपोर्ट मंगा कर मुआवजे का निर्धारण करें और तय राशि की आधी-आधी राशि बैंक तथा राज्य सरकार से लेकर याची को अदा करें।

कोर्ट ने मुख्य सचिव को यह भी निर्देश दिया है कि वह सभी जिलाधिकारियों को सकुर्लर जारी कर लोन नहीं अदा करने वालों की गिरफ्तारी को लेकर तय कानून के पालन का निर्देश दें। कोर्ट ने कहा कि याची को ओटीएस स्कीम का लाभ दिया जाए और उससे वसूली न की जाए। मामले के अनुसार याची के पिता रामेश्वर ने 12 सितंबर 2000 को ग्राम विकास बैंक से ट्रैक्टर खरीदने के लिए डेढ़ लाख रुपये का लोन लिया था। इसकी किश्ते जमा नहीं कर सके। 16 अप्रैल 2018 को उनकी मृत्यु हो गई।
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बैंक से 2013 में संग्रह राशि जोड़कर नौ लाख 16 हजार रुपये से अधिक की वसूली की कार्यवाही शुरू कर दी। इसके तहत शिवनारायण को गिरफ्तार कर 14 दिन जेल में रखा गया। कोर्ट ने कहना था कि व्यवहार प्रक्रिया संहिता की धारा 11 और राजस्व संहिता में लोन वसूली की प्रक्रिया दी गई है। इसके मुताबिक ही वसूली की जा सकती है।
किसान की क्षमता देख कोर्ट कर सकती है फैसला

फैसला सुनाते हुए जस्टिस एसपी केसरवानी ने कहा कि समाज के कमजोर वर्ग के उत्पीड़न को अदालत आंख बंद करके नहीं देख सकती है। किसान का जीवन संघर्ष से भरा हुआ है। अदालत उसकी आर्थिक स्थिति और क्षमता को देखते हुए फैसला ले सकती है, तकनीकी कारण न्याय देने में बाधा नहीं बन सकते। उत्तराधिकारी से वसूली उसे मिले हक की हद तक ही की जा सकती है उसकी गिरफ्तारी नहीं हो सकती। 
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