इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि संज्ञेय अपराधों में एक आर आरोप पत्र दाखिल होने के बाद भी पुलिस अधिकारी जांच को आगे जारी रख सकते हैं। जांच को आगे जारी रखने में पुलिस अधिकारी को मजिस्ट्रेट के आदेश की जरूरत नहीं है। कोर्ट ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 173(2) में इसकी व्यवस्था की गई है। जांच को आगे जारी रखा जा सकता है। यह आदेश न्यायमूर्ति अंजनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति दीपक वर्मा की खंडपीठ ने सुबोध कुमार जैन उर्फ सुबोध जैन की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।
मामले में याची के खिलाफ आगरा जिले के सिकंदरा थाने में लूट के मामले में आईपीसी की धारा 392 और 411 के तहत नौ मार्च 2019 में एफआईआर दर्ज कराई गई थी। याची का कहना था कि उसका नाम आरोपी के रूप में नहीं था। शुरू में पुलिस द्वारा दाखिल आरोप पत्र में चार लोगों पर आरोप लगाए गए थे। मामले में पुलिस ने अपनी जांच आगे जारी रखी और याची के आवास पर पहुंच गई। इसके खिलाफ याची ने जिला न्यायालय में अर्जी दाखिल की, जिस पर सत्र न्यायालय ने पुलिस से जानकारी मांगी।
पुलिस की ओर से प्रस्तुत रिपोर्ट में याची को वांछित बताया गया। इसके बाद याची ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। याची की ओर से तर्क दिया गया कि जब एक बार आरोप पत्र का संज्ञान ले लिया गया तो जांच समाप्त हो गई। इसके बाद पुलिस बिना मजिस्ट्रेट की अनुमति के आगे की जांच नहीं कर सकती है।
जवाब में सरकारी अधिवक्ता ने कहा कि अनुमति मांगने की कोई आवश्यकता नहीं है। क्योंकि, सीआरपीसी की धारा 173(2) के तहत पुलिस केपास जांच केलिए असीमित शक्तियां हैं। आरोपपत्र दाखिल होने केबाद भी जांच कर सकती है। इसके अलावा पुलिस 156 (1) के तहत भी जांच जारी रख सकता है। हालांकि, असंज्ञेय मामलों ऐसा नहीं है।