इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि निश्चित समय केलिए सेवा से अनुपस्थिति के आधार पर वारंट जारी करने का आधार नहीं हो सकता है और न ही उसे पद से हटाया जा सकता है। हाईकोर्ट ने कहा कि मुख्य चिकित्सा अधीक्षक कोई सार्वजनिक कार्यालय नहीं है। इसलिए वारंट जारी नहीं किया जा सकता है। यह आदेश न्यायमूर्ति नीरज तिवारी ने सोहन लाल शर्मा की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।
मामले में याची (नेत्र परीक्षण अधिकारी) एटी जिला अस्पताल में तैनात है। उसने जिला अस्पताल के सीएमएस के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर कर वारंट जारी करने और उन्हें पद से हटाए जाने की मांग की है। मामले में याची के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि सीएमएस पहले कानपुर नगर में तैनात थे। सात जुलाई 2015 को वहां से उनका स्थानांतरण जिला अस्पताल एटा में वरिष्ठ सलाहकार के पद पर कर दिया गया।
ज्वाइनिंग के बाद वह तीन साल तक गायब रहे। बाद में उन्होंने 2018 में फिर सेवा से जुड़ गए। चिकित्सा विभाग ने 20 सितंबर 2020 को आदेश जारी कर मुख्य चिकित्साधिक्षक पद पर नियुक्ति कर दी। याची ने चिकित्सा विभाग के 2020 केआदेश को चुनौती देते हुए हाइकोर्ट में याचिका दाखिल की और सीएमएस केखिलाफ वारंट जारी कर उन्हें पद से हटाए जाने की मांग की।
कोर्ट ने कहा कि तीन वर्ष तक सेवा से अनुपस्थिति होने से वारंट जारी करने का आधार नहीं बन सकता है। प्रतिवादी का कृत्य अनियमितता की श्रेणी में है लेकिन यह अवैधता की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है। नियोक्ता होने के नाते सरकार को यह अधिकार है कि वह उसे तीन साल तक गायब रहने केबावजूद सीएमएस के पद पर तैनात कर सकती है। इसे अवैध नहीं कहा जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि यह याचिका पोषणीय नहीं है। लिहाजा, इसे खारिज किया जाता है।