आरोपी के वकील ने दलील दी कि पीड़िता और वादी ने ट्रायल कोर्ट में अभियोजन की कहानी का समर्थन नहीं किया है। आरोपी जेल में चार साल से अधिक समय बीत चुका है। वह जमानत का हकदार है। जबकि, अभियोजन की दलील थी कि पीड़िता की मुख्य परीक्षा और प्रति परीक्षा के बीच काफी समय का अंतर रहा। आरोपी के वकील के अनुरोध पर जिरह स्थगित की गई थी।
इस दौरान गवाहों को प्रभावित किया गया। इसी के बाद पीड़िता बयान से मुकरी है। यदि गवाही के तुरंत बाद जिरह पूरी होती तो गवाह न पलटते। इसलिए आरोपी जमानत का हकदार नहीं है। वह रिहाई के बाद बाकी गवाहों को भी प्रभावित करेगा। कोर्ट ने इस आदेश की प्रति देश के सभी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीशों को भेजने का निर्देश दिया है। जिसे वह अपने अधीनस्थ ट्रायल कोर्ट को भी भेजें और ट्रायल कोर्ट की लेटलतीफी की कार्यशैली में बदलाव आए।