अदालत के निर्देश पर किए गए पीड़िता के अस्थि परीक्षण (आसिफिकेशन टेस्ट) से पता चला कि उसकी उम्र 19 वर्ष थी। कोर्ट ने कहा कि पाक्सो अधिनियम 18 वर्ष से कम आयु के नाबालिगों को यौन शोषण से बचाने के लिए बनाया गया है, लेकिन मौजूदा मामले में अस्थि परीक्षण रिपोर्ट के आभाव में आरोपी को गंभीर परिणाम भुगतने पड़े। उसे जेल में रहना पड़ा। कोर्ट ने इस आधार पर आरोपी को जमानत पर रिहा करने का आदेश दे दिया।
पीड़िता को जांच के नाम पर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने को लेकर कोर्ट नाराज
जमानत का आदेश देने के साथ ही कोर्ट ने जिला अस्पतालों में रेडियोलॉजिस्ट उपलब्ध कराने में असमर्थता के लिए अधिकारियों की कार्यशैली की आलोचना की, जिसके कारण पीड़िता की आयु निर्धारित करने के लिए आवश्यक अस्थि परीक्षण में देरी हुई। जांच के लिए पीड़िता को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना पड़ा।
कोर्ट ने हैरानी जताते हुए कहा कि रेडियोलॉजिस्ट की अनुपलब्धता के कारण बलिया के मुख्य चिकित्सा अधिकारी को पीड़िता को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजना पड़ा। जिससे पीड़िता को और अधिक आघात पहुंचा।
कोर्ट ने कहा कि कई मामलों में देखा गया है कि सूबे के जिलों में रेडियोलॉजिस्ट तैनात नहीं हैं। इसकी अधिकारी पीड़ितों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक दौड़ाते रहते है। कोर्ट ने महानिदेशक को हलफनामे संग अदालत में पेश होकर बताने को कहा है कि जिलों में कितने रेडियोलॉजिस्टों तैनात हैं। उनकी योग्यता और सरकारी कोटे से उन्हें किस हद तक लाभ मिल रहा है।