हिन्दी कथा के सशक्त हस्ताक्षर रवींद्र कालिया होते तो आज पूरे 77 बरस के होते। यह अलग बात है कि उन्हें अपना जन्मदिन मनाने का कोई शौक नहीं था और शायद ही उन्होंने कभी अपने मुंह से किसी को अपने जन्मदिन के बारे में बताया हो लेकिन परिजन, परिचित, प्रशंसक उन्हें भला कहां छोड़ने वाले थे। कभी बेटों तो कभी पास या दूर के दोस्तों की ओर से कोरियर से बर्थडे केक आ ही जाता और शुभकामनाओं का दौर भी चलता। अबकी यह सब कुछ नहीं होगा। अभी उन्हें हम सभी को अलविदा कहे हुए एक बरस भी नहीं बीते हैं, ऐसे में परिजनों की ओर से कोई कार्यक्रम नहीं रखा गया है।
इसके बावजूद उनके जाने के बाद अब जन्मदिन पर उनकी याद बरबस आती है। मेहंदौरी के मकान से भले ही ‘कालियॉज’ की नेमप्लेट उतर गई हो लेकिन इलाहाबाद की स्मृतियों में वह उसी जिंदादिली के साथ बोलते-बतियाते, ठहाके लगाते शिद्दत से मौजूद हैं क्योंकि इलाहाबाद उनकी सांसों में रचा-बसा था। बतौर रचनाकार या संपादक इलाहाबाद और उनका इलाहाबादीपन हमेशा उनके साथ रहा। दूर दिल्ली में रहकर भी बाल कटवाने या डॉक्टर से मुलाकात के लिए यहां आते थे। उनमें दोस्तों की महफिलें जुटाने और रचनाकारों की मदद का नशा तो था ही। अपने जन्मदिन पर वह कोई उत्सव, समारोह नहीं करते लेकिन बाहर होने पर इलाहाबाद को जरूर याद करते थे।
‘अमर उजाला’ से बातचीीत में बेटे प्रबुद्ध ने स्मृतियां सहेजीं। कहा, पापा सादगी पसंद थे। उन्हें अपना जन्मदिन मनाने का कोई शौक नहीं था। बस, हम लोग ही केक लाकर काटते और उनके संग खुशियां साझा करते थे। हालांकि शुरुआत में इसके लिए डांट भी मिलती थी। बीते जन्मदिन पर तो धनतेरस था सो पूरे परिवार के लोगों ने संग बैठकर उनका जन्मदिन मनाया था। खाने में भी कुछ खास नहीं, बस उन्हें आलू-मेथी की सूखी सब्जी और धुली मूंग की दाल बेहद पसंद थी, इसे वह ‘हैप्पी मील’ कहते थे। जन्मदिन पर भी मम्मी ने खाने के लिए च्वॉयस पूछी तो हंसकर बोले, ‘हैप्पी मील’ बना लो और हम सब हंस पड़े। अब तो बस यादें ही बाकी हैं।