मुंबई में चार जनवरी 1932 को महात्मा गांधी की गिरफ्तारी के बाद इलाहाबाद में भी जबर्दस्त हड़ताल हुई। नगर कांग्रेस कमेटी की ओर से जानसेनगंज स्थित दरवेश्वरनाथ मंदिर के करीब शाम को जुलूस निकालने का एलान किया गया। तत्कालीन ब्रिटिश अधिकारियों को यह मंजूर नहीं था। लेकिन, जुलूस पर रोक के बावजूद बड़ी संख्या में लोग एकत्रित हुए।
अंग्रेज पुलिस ने जुलूस को तितर-बितर करने के लिए न सिर्फ लाठीचार्ज किया बल्कि घुड़सवार पुलिस ने जुलूस पर अपने घोड़े भी दौड़ाए। इस अफरातफरी में चार सत्याग्रही कुचलकर शहीद हो गए थे। इसमें 62 वर्षीय कारोबारी नियामतुल्ला, 64 वर्षीय पोस्ट ऑफिस के सेवानिवृत्त कर्मचारी सूरज नारायन, 30 वर्षीय दर्जी सोहन लाल और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के 18 वर्षीय छात्र हरनारायन शामिल थे।
शहीदों की स्मृतियों को संजो रही संस्था भारत भाग्य विधाता के अध्यक्ष वीरेंद्र पाठक ने जोड़ा, आंदोलन के तकरीबन सौ दिनों बाद 13 अप्रैल 1932 को नगर में फिर एक जुलूस निकाला गया जिसका नेतृत्व सीएवी इंटर कालेज के 16 वर्षीय विद्यार्थी त्रिलोकी नाथ कपूर ने किया। यह जुलूस कमला नेहरू रोड पर सूरजकुंड के पास जैसे ही पहुंचा, जुलूस को रोकने के लिए जिला मजिस्ट्रेट ने जुलूस पर गोली चलाने का आदेश दे दिया। फिर क्या था, अफरातफरी के बीच फायरिंग में त्रिलोकी नाथ कपूर के सीने पर गोली लगी और वह शहीद हो गए। इस हादसे केदौरान प्रदर्शन कर रहे पंद्रह अन्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी गोलियां लगने से बुरी तरह घायल हो गए थे।