एक्साइज ड्यूटी के लगातार हो रहे विरोध के बीच सोने-चांदी की कीमतों में अस्थिरता से सराफ कारोबारी भले चिंतित हों, लेकिन इसका फायदा ग्राहकों को मिल रहा है। बीते कुछ वर्षों तक इसकी कीमतों में जबरदस्त इजाफा हुआ लेकिन पिछले करीब एक वर्ष में कीमतों में तेजी का रुख नहीं रह गया है। कारोबारी इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट, डॉलर की अस्थिरता और शेयर बाजार में गिरावट को कारण मान रहे हैं।
वर्ष 2008 में सोना 8000-9000 रुपये प्रति दस ग्राम के स्तर पर था, लेकिन इसके बाद कीमतों ने रफ्तार पकड़ ली। साल-दर साल कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई और वर्ष 2015 के मध्य तक यह अपने उच्च स्तर 34000 रुपये प्रति दस ग्राम तक पहुंच गया। इसके बाद से कीमतों पर ब्रेक लगने लगा। इस बीच कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट और अतंरराष्ट्रीय मार्केट में डॉलर की अस्थिरता का सीधा असर सोने की कीमत पर पढ़ा। नतीजा हुआ कि वर्ष 2015 के अंत तक इसका भाव प्रति दस ग्राम 25000-26000 रुपये तक आ गया और अब सोने का भाव 30000 रुपये प्रति दस ग्राम के आसपास है। यानी बीते सात वर्ष में कीमत में करीब चार गुना की बढ़ोतरी, फिर वर्ष 2015 से अब तक नौ हजार रुपये की गिरावट के बाद पिछले कुछ माह में प्रति दस ग्राम पांच हजार रुपये तक की तेजी आई है।
कमोबेश यही हाल चांदी का है। एक समय अपने उच्चतम स्तर 76000 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई चांदी वर्तमान में 36000 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास आ गई है। बीते सात वर्ष में 40000 हजार रुपये तक की गिरावट सराफ व्यापारियों को परेशान करने के लिए काफी है। सराफ कारोबारी अतुल चड्ढा का कहना है फेडरल बैंक ऑफ अमेरिका से डॉलर पर ब्याज तय न होने के कारण सोने-चांदी का बाजार अस्थिर है। कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता का भी असर सोना-चांदी पर है। बहरहाल बाजार में गिरावट का सीधा फायदा ग्राहकों को हो रहा है।