प्रयागराज। अग्रिम जमानत के प्रावधानों की व्याख्या करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा कि अग्रिम जमानत के लिए सीधे हाईकोर्ट में भी अर्जी दाखिल की जा सकती है। इसके लिए यह जरूरी नहीं है कि सत्र न्यायालय में अग्रिम जमानत खारिज होने के बाद ही हाईकोर्ट आया जाए।
हाईकोर्ट ने कहा कि अग्रिम जमानत अर्जी जिला न्यायालय अथवा हाईकोर्ट दोनों में से किसी में भी दाखिल की जा सकती है। हाईकोर्ट और सत्र न्यायालय दोनों को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 438 में बराबर अधिकार हैं। आरोपी वादकारियों को दोनों में से किसी भी न्यायालय में अग्रिम जमानत के लिए सीधे अर्जी दाखिल करने का अधिकार है। यह फैसला न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने विनोद कुमार की जमानत अर्जी को खारिज करते हुए दिया है। अर्जी पर वरिष्ठ अधिवक्ता डीएस मिश्र, इमरानउल्लाह, राज्य सरकार की तरफ से एजीए एआई पी श्रीवास्तव व विकास सहाय ने पक्ष रखा।
कोर्ट ने कहा कि प्रदेश में अग्रिम जमानत के प्रावधान संविधान द्वारा दी गई वैयक्तिक स्वतंत्रता एवं अनावश्यक उत्पीड़न से बचाव की गारंटी के तहत लागू किया गया है। यह निराधार आरोपों पर उत्पीड़न से बचने के लिए है। कोर्ट ने कहा कि अग्रिम जमानत संबंधित न्यायालय द्वारा आरोपी को समन जारी किए जाने तक प्रभावी रहेगी। धारा 173 उपखंड दो दंड प्रक्रिया संहिता के तहत दाखिल रिपोर्ट पर कोर्ट संज्ञान लेते हुए आरोपी को समन जारी करती है। कोर्ट ने कहा कि आरोपी चाहे तो नियमित जमानत ले सकता है। सत्र न्यायालय में अर्जी खारिज होने पर ही हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल की जा सकती है, यह सही नहीं है। हाईकोर्ट के ही कुछ फैसलों से इस मुद्दे पर विरोधाभास की स्थिति पैदा हो गई थी। कुछ मामलों में कोर्ट ने कहा था कि पहले अधीनस्थ न्यायालय में जाएं। वहां अर्जी खारिज होने के बाद हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल करें। इस फैसले से आपराधिक मामले में गिरफ्तारी से बचने के लिए आरोपी सीधे हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल कर सकता है। पहले सत्र न्यायालय में अर्जी दाखिल करना जरूरी नहीं है।
यह था मामला
याची के खिलाफ 11 जुलाई 19 को एफआईआरदर्ज कराई गई और 16 अक्तूबर को सत्र न्यायालय ने अर्जी खारिज कर दी। इसके बाद हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल की गई। सवाल उठा कि क्या हाईकोर्ट आने के लिए पहले सेशनकोर्ट में अर्जी दाखिल करना आवश्यक है? कई फैसलों में भिन्न दृष्टिकोण अपनाए गए थे। कोर्ट ने इस प्रश्न का समाधान करने के बाद याची को अग्रिम जमानत पर छोडे़ जाने का ठोस आधार न पाए जाने पर अर्जी खारिज कर दी।