पूरब का ऑक्सफोर्ड’ कह जाने वाले इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हॉस्टलों से ठेकेदारी का कारोबार चल रहा है। विश्वविद्यालय में कोई ऐसा कार्य नहीं, जो हॉस्टलों के इन तथाकथित ठेकेदारों की मंजूरी के बिना कराया जा सके। हर काम पर दस से 20 फीसदी कमीशन वसूला जाता है और मना करने पर काम रुकवाने की धमकी दी जाती है।
जीएन झा हॉस्टल के सामने वाली जमीन पर चार करोड़ रुपये की लागत से बन रहे स्टूडेंट एक्टिविटी सेंटर को लेकर भी यही हुआ लेकिन यहां दो छात्रों की जिद टकराव का कारण बन गई और इस लड़ाई में एक छात्र को अपनी जान गंवानी पड़ी। सूत्रों का कहना है कि वर्तमान में विश्वविद्यालय के निर्माण कार्यों पर सिर्फ एक पूर्व छात्र नेता का कब्जा है और वह इस वक्त नैनी जेल में बंद है। जेल में बंद रहते हुए वह अपनी गतिविधियों को हॉस्टल में रहने वाले छात्रों के माध्यम से संचालित कर रहा है। इसके बदले वह हॉस्टल में अपने समर्थक छात्रों को संरक्षण प्रदान करता है।
सूत्रों के मुताबिक जीएन झा हॉस्टल में टेबल टेनिस हॉल के पुनरोद्धार के काम पर भी नैनी जेल में बंद पूर्व छात्र नेता ने कब्जा कर लिया। छात्र नेता तो जेल में बंद था लेकिन, काम उसके लोगों ने कराया। हालांकि काम पूरा होने के बाद टेबल टेनिस हॉल अब भी विश्वविद्यालय को हैंडओवर नहीं किया गया है, बल्कि वहां कई तख्त और अन्य सामान रखकर कब्जा शुरू कर दिया गया है। जीएन झा में ही तकरीबन 90 लाख रुपये की लागत से रंगाई-पुताई का टेंडर हुआ था। यह काम नैनी के एक ठेकेदार को मिला था।
काम शुरू होते ही पूर्व छात्र नेता के लोग वहां पहुंच गए और ठेकेदार पर कमीशन देने का दबाव बनाया। ठेकेदार भी अड़ गया और उसने कमीशन देने से मना कर दिया। दबंगों ने काम रुकवा दिया तो ठेकेदार ने इविवि प्रशासन से सुरक्षा मांगी। सुरक्षा मिलने के बाद काम शुरू करा गया गया तो काम की गुणवत्ता को लेकर उसी पूर्व छात्र नेता के लोगों ने बवाल शुरू कर दिया। आखिरकार ठेकेदार को काम बीच में छोड़कर जाना पड़ा। हॉस्टल की रंगाई-पुताई का काम तब से अधूरा पड़ा है।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रशासन पांच लाख रुपये से ऊपर का काम सीपीडब्ल्यूडी के माध्यम से कराता है। सीपीडब्ल्यूडी की ओर से टेंडर निकाल कर यह काम किसी एजेंसी को दिया जाता है लेकिन एजेंसी की ओर से मौके पर जैसे ही काम शुरू कराया जाता है, हॉस्टलों में रहने वाले तथाकथित ठेकेदार वहां पहुंच जाते हैं। अगर एजेंसी ने कमीशन दिया तो काम आगे बढ़ाने की मंजूरी दी जाती और मना किया तो मजदूरों को मारपीट कर काम रुकवा दिया जाता है।
इविवि के ज्यादातर हॉस्टलों के कुछ कमरों पर ऐसे दबंगों का कब्जा है, जहां से ठेकेदारी का कारोबार चलता है। पूर्व छात्र नेता अच्युतानंद शुक्ला की हत्या के बाद हॉस्टल में हुई छापेमारी से यह बात साबित भी हो गई थी लेकिन, इसके बाद भी इविवि एवं पुलिस प्रशासन नहीं चेता और अब पूर्व छात्र रोहित शुक्ला की हत्या से एक बार फिर यह साफ हो गया है कि हॉस्टलों में ठेकेदारी को खुला खेल चला रहा है।
हॉस्टलों में रहने वाले कुछ दबंगों के कारण पूरे हॉस्टल को बदनामी का सामना करना पड़ता है और इसमें पढ़ने-लिखने वाले छात्र ही पिसते हैं। हॉस्टलों में चल रही छापेमारी के दौरान कमरों पर कब्जा करके रहने वाले अराजकतत्व वहां ताला लगाकर भाग निकले लेकिन, जवाब वहां रहने वाले नियमित छात्रों को देना पड़ रहा है। कार्रवाई के दौरान पुलिस जहां भी ताला लगा देख रही है, उसे तोड़ दिया जाता है। इनमें से कई कमरे ऐसे हैं, जहां नियमित छात्र रहते हैं और कमरे उनके नाम से आवंटित हैं लेकिन, कार्रवाई के दौरान वह परीक्षा देने गए होते हैं या किसी अन्य कार्य से हॉस्टल बाहर होते हैं। ऐसे छात्रों को भी अब बेवजह दिक्कत झेलनी पड़ रही है।