यह आरोप लगाया भी गया है कि यह राशि न तो पीड़ितों को दी जा रही है और न ही कैदियों को वापस की जा रही है। याचिका में गुजरात राज्य बनाम गुजरात उच्च न्यायालय के मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का भी हवाला दिया गया है, जिसमें यह माना गया है कि कैदी न्यूनतम वेतन अधिनियम के दायरे से बाहर थे। क्योंकि, कैदियों और राज्य के बीच नियोक्ता और कर्मचारी का संबंध नहीं है।
यह भी कहा गया है कि बदलते समय के साथ जेलों में बनने वाले उत्पादों से राज्य को फायदा होने लगा है। ऐसे उत्पाद खुले बाजार में बेचे जा रहे हैं और ऐसी बिक्री से प्राप्त आय से राज्य को लाभ हो रहा है। इस तरह से ऐसे मामलों में कर्मचारी-नियोक्ता संबंध स्थापित भी हो रहा है।
इसी मुद्दे में एक याचिका (बंदी अधिकार आंदोलन बिहार बनाम भारत संघ व अन्य) सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। दूसरे राज्यों में नए संशोधित वेतन नीतियां भी बनाई गईं हैं, जो कैदियों को लाभ पहुंचाने वाली हैं। लिहाजा, यूपी सरकार के मौजूदा आदेश को रद्द कर न्यूनतम वेतन अधिनियम के अनुसार मानदेय तय करने का निर्देश दिया जाए।