आरुषि-हेमराज हत्याकांड में तलवार दंपति के अलावा किसी तीसरे व्यक्ति का भी हाथ होने की संभावना पर सीबीआई की जांच कुछ दूर चलने के बाद ही ठहर गई। एजेंसी ने जांच की शुरूआत में डा. तलवार के कंपाउंडर कृष्ण और नौकर राजकुमार तथा विजय मंडल को गिरफ्तार कर पूछताछ की। मगर इसके बाद उनको क्लीन चिट देते हुए पूरी जांच तलवार दंपति पर केंद्रित कर दी।
सीबीआई ने अपनी जांच में यह मान लिया कि घटना की रात फ्लैट अंदर से बंद था। फ्लैट के भीतर चार लोग राजेश तलवार, नुपुर तलवार, आरुषि और हेमराज ही थे। किसी ने रात में दरवाजा नहीं खोला तो फिर हत्या तलवार दंपति ने ही की है। हत्या में उपयोग किया गया औजार सर्जिकल था। कमरे में साक्ष्य मिटाए गए थे। जिस बेड पर आरुषि की लाश पड़ी थी, उसकी चादर बदली गई लिहाजा यह सब घर के भीतर मौजूद कोई व्यक्ति ही कर सकता है।
सीबीआई कोर्ट गाजियाबाद ने भी अपने फैसले में मुख्य रूप से यही आधार लिया कि जब बाहर से कोई नहीं आया तो हत्या घर के भीतर मौजूद लोगों ने ही की है। तलवार दंपति के वकीलों ने सीबीआई की इसी थ्योरी पर सवाल उठाए और अंतत: उसे गलत साबित किया। वकीलों ने फ्लैट में चार के बजाए सात लोगों की मौजूदगी की संभावना जताई। कृष्णा के बेड पर हेमराज के डीएनए प्रिंट का मौजूद होना। नौकर से बरामद खुखरी की जांच आदि कई ऐसे सवाल उठे जिन्होंने इस संदेह को पर्याप्त बल दिया कि घटना की रात फ्लैट में चार लोग ही मौजूद थे यह बात निर्विवाद रूप से साबित नहीं होती है। सीबीआई इस बात का पुख्ता सबूत नहीं दे पाई कि 15/16 मई 2008 की रात फ्लैट में चार लोग ही थे, या बाहर से कोई व्यक्ति नहीं आ सकता था।
तलवार दंपति को बरी करते हुए हाईकोर्ट की खंडपीठ ने मुख्य रूप से इसी अवधारणा को खंडित किया है कि हत्या में किसी तीसरे पक्ष का हाथ होने की संभावना को पुख्ता रूप से खारिज नहीं किया जा सकता है। हत्या में तलवार दंपति का हाथ साबित करने के लिए घटनाक्रमों को जिस तारतम्यता के साथ प्रस्तुत किया जाना चाहिए था वह भी सीबीआई नहीं कर पाई। बहस के दौरान सीबीआई की कहानी में कई जगह लोच नजर आया। आरुषि के कमरे का इंटरनेट राउटर घटना के कई घंटे बाद बंद हुआ। उसे किसने बंद किया, यह साबित नहीं हो सका। सर्जिकल चाकू के अलावा हत्या में दूसरा कौन सा हथियार प्रयोग किया गया यह भी सीबीआई निर्विवाद रूप से साबित नहीं कर सकी। तलवार के वकीलों की दलील थी कि सीबीआई ने तलवार दंपति के अलावा किसी और का हाथ होने की संभावना पर जांच ही नहीं की और पहले से ही उनको दोषी मानते हुए सारी जांच उन्हीं पर केंद्रित कर दी। इस दलील को हाईकोर्ट ने भी सही माना है।