मेजा और कोरांव में काले हिरनों की संख्या कितनी है, यह प्रशासन को भी नहीं मालूम। हालांकि दावे जरूर किए जाते हैं कि उनके संरक्षण के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। वन विभाग के पास ऐसा कोई आंकड़ा नहीं, जिससे काले हिरनों की संख्या का अनुमान लगाया जा सके। मेजा के चांद खमरिया और गड़ेरिया में काले हिरनों की संख्या काफी थी लेकिन मध्यप्रदेश से आए शिकारियों ने काफी नुकसान पहुंचाया है। साथ ही पानी और भोजन के संकट से भी उनकी जान खतरे में रही। वहीं मध्यप्रदेश के शिकारियों की आवाजाही पर कोई रोक-टोक भी वन विभाग नहीं लगा सकी।
जिला मुख्यालय से 60 किलोमीटर दूर मेजा का चांद खमरिया गांव काले हिरनों के लिए संरक्षित किया गया है। बावजूद इसके काले हिरनों का जमकर शिकार हुआ है। जबकि भूख और प्यास से भी इनकी मौत हुई। मई 2017 में पानी की तलाश में गांव की तरफ आए एक काले हिरन को कुत्तों ने अपना निवाला बना लिया था। प्रशासन का दावा है कि पानी के लिए चांद खमरिया में छोटे-छोटे पक्के तालाब बनवाए गए हैं लेकिन उन तालाबों में कभी भी पानी नहीं भरा जाता। प्यासे काले हिरन नदी का रुख करते हैं, जहां शिकारी पहले से घात लगाए बैठे रहते हैं।
दो माह पहले जिलाधिकारी संजय प्रसाद ने संरक्षित क्षेत्र का निरीक्षण किया था मगर कोई ठोस उपाय नहीं किया गया। सुरक्षा की दृष्टि से जो वनरक्षकों की तैनाती की गई, उन्होंने भी जिम्मेदारी नहीं निभाई। पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण जगह होने के बावजूद सरकार इस पर कोई ध्यान नहीं दे पा रही है। जबकि दोनों ग्राम पंचायतों के प्रधानों ने काले हिरनों की सुरक्षा के लिए किसी प्रकार का बंदोबस्त न होने की शिकायत जिलाधिकारी से की थी। कोरांव एसडीएम रामशंकर और मेजा एसडीएम जवाहर लाल श्रीवास्तव के पास काले हिरनों का कोई आंकड़ा नहीं है। मेजा के वन क्षेत्राधिकारी आरएन यादव भी काले हिरनों की संख्या नहीं बता सके। कहते हैं, वर्ष 2012 में काले हिरनों की संख्या 500 के करीब थी। अभी क्या होगी, नहीं मालूम।
पावर प्लांट के कारण पलायन कर रहे काले हिरन
मेजा कोहड़ार पावर प्लांट के लिए लगातार हो रहे खनन और शोरगुल से काले हिरनों का पलायन जारी है। इन इलाकों में काले हिरनों की संख्या न के बराबर है। ग्रामीण बताते हैं कि कभी कभार ही काले हिरन दिखाई देते हैं। पावर प्लांट प्रबंधन ने प्रोजेक्ट लगने से पहले पूरे क्षेत्र को हरियाली और पानी की सुविधा से जोड़ने का वादा किया था। प्रोजेक्ट शुरू होने के सालों बाद भी काले हिरनों के संरक्षण के लिए ठोस पहल नहीं की गई। भीषण गर्मी में भूख और प्यास से लगातार काले हिरनों की मौत हो रही है। इसके बावजूद जिला प्रशासन और वन विभाग नहीं चेत रहा है।