फिराक गोरखपुरी से जुड़े किस्से सुनाते यश मालवीय, प्रो. हेरंब चतुर्वेदी, प्रो. असलम और अहमद महफूज।।
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इसके बाद फिराक गोरखपुरी के साहित्यिक योगदान पर चर्चा शुरू हुई। इसमें प्रो. असलम, जामिया मिल्लिया इस्लामिया के प्रो. अहमद महफूज और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रो. हेरम्ब चतुर्वेदी, गीतकार यश मालवीय ने अपने अनुभवों के साथ किस्सागोई को साझा किया। प्रो. महफूज ने फिराक साहब की तुलना मिर्जा गालिब से की। कहा कि उनकी उर्दू शायरी, नज़्में, और रुबाइयां गजल की दुनिया में बेजोड़ हैं। इनके बाद प्रो. हेरम्ब चतुर्वेदी का कहना था कि फिराक अक्सर रातभर जागकर शायरी करते थे।
यश मालवीय बताते हैं कि एक बार लाल किले पर आयोजित मुशायरे में फिराक राष्ट्रपति की विशेष कुर्सी पर जाकर बैठ गए। जब तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद वहां पहुंचे, तो उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा, ‘आइए, आइए! तशरीफ रखिए। आप ही की तो एक तशरीफ है। अंत में प्रो. असलम ने भी फिराक से जुड़े संस्मरणों को साझा किया।
वेटरन बैंड की प्रस्तुतियों ने किया मुग्ध
बज़्म-ए-विरासत का अगला सत्र इलाहाबाद के मशहूर वेटरन बैंड की ओर से प्रस्तुत किया गया। इसे भारतीय रॉक संगीत के प्रणेता और प्रचारक, अमित सहगल को समर्पित किया गया। अमित सहगल, जिन्हें भारतीय रॉक संगीत समुदाय में प्यार से ’पापा रॉक’ कहा जाता था, एक प्रतिभाशाली संगीतकार, प्रकाशक भी थे।