श्रृंगवेरपुर स्थित भगवान राम और निषादराज की प्रतिमा।
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प्रभु श्रीराम के जीवन और वनवास प्रसंग से प्रयागराज का विशेष संबंध है। रामायण में वर्णन मिलता है कि वनवास के लिए अयोध्या से निकल कर प्रभु श्रीराम प्रयागराज के शृंगवेरपुर धाम पहुंचे थे, जहां उन्होंने रात्रि निवास कर अपने मित्र निषादराज की मदद से गंगा नदी पार की थी। फिर भरद्वाज मुनि के आश्रम पहुंचे थे। श्रृंगी ऋषि की तपस्थली होने कारण ही यह क्षेत्र शृंगवेरपुर कहलाता है। महाकुंभ से पहले यहां भव्य कॉरिडोर का निर्माण किया गया है, जिसमें लगी विशाल प्रतिमा और निषादराज पार्क श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र होगा।
रामायण में वर्णन आता है कि पुत्रकामेष्टी यज्ञ के लिए राजा दशरथ ने वशिष्ठ मुनि के कहने पर श्रृंगी ऋषि को अयोध्या बुलाया था। श्रृंगी ऋषि के यज्ञ फल से ही राजा दशरथ को राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के रूप में चार पुत्रों की प्राप्ति हुई थी। ऋषि विभाण्डक के पुत्र श्रृंगी ऋषि की तपस्थली होने के कारण गंगा तट का यह क्षेत्र शृंगवेरपुर कहलाता है। रामायण की कथा में वर्णित है कि प्रभु श्रीराम की बहन शांता का विवाह श्रृंगी ऋषि के साथ ही हुआ था। आज भी शृंगवेरपुर में श्रृंगी ऋषि और शांता मां का मंदिर है, जहां श्रद्धालु संतान प्राप्ति की कामना और पूजन करते हैं।