अलीगढ़ के शमशाद की आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति पंकज नकवी और न्यायमूर्ति एसएस शमशेरी की पीठ ने यह आदेश दिया। मामले के तथ्यों के अनुसार अभियुक्त शमशाद के खिलाफ नौ वर्षीय पीड़िता की मां ने 15 अप्रैल 2009 में रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि अभियुक्त पीड़िता को बहला फुसलाकर एकांत स्थान पर ले गया और उससे दुष्कर्म किया।
पुलिस ने दुष्कर्म के साथ ही एससीएसटी एक्ट की धाराओं में भी मुकदमा दर्ज कर चार्जशीट पेश की। सेशन कोर्ट ने पीड़िता के बयान और अन्य साक्ष्यों को देखते हुए शमशाद को उम्रकैद तथा 50 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई।
सजा के खिलाफ अपील पर बहस के दौरान यह कहा गया कि अभियुक्त को इस बात की जानकारी नहीं थी कि पीड़िता एससी है। उसने इसलिए अपराध नहीं किया कि पीड़िता एससी है, इसलिए यहां एससी-एसटी एक्ट के प्रावधान लागू नहीं होंगे।
कोर्ट ने कहा कि अभियोजन यह प्रमाणित करने में असफल रहा है कि अभियुक्त ने पीड़िता के साथ इसलिए अपराध किया कि वह एससी है। अभियुक्त पीड़िता को पहले से नहीं जानता था। इसलिए यहां एससीएसटी एक्ट के प्रावधान लागू नहीं होंगे। सजा पर बहस के दौरान बचाव पक्ष ने सुप्रीमकोर्ट के कई फैसलों की नजीरें पेश कर सजा कम करने की मांग की।
कोर्ट ने कहा कि घटना के समय अभियुक्त लगभग 20 साल का था। वह 12 वर्ष के करीब जेल में बिता चुका है। इस मामले में दस वर्ष की सजा न्याय की मंशा को पूरी करती है। कोर्ट ने जेल में बिताई गई अवधि को पर्याप्त सजा मानते हुए अभियुक्त को रिहा करने का आदेश दिया है।