शिक्षा सेवा अधिकरण
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हाईकोर्ट की तरह क्षेत्राधिकार बंटवारे पर सहमत हैं वकील
0 अधिकरण पर निकाला जा सकता है बीच का रास्ता मगर विधायन पर ही उठ रहे सवाल
अमर उजाला ब्यूरो
प्रयागराज। शिक्षा सेवा अधिकरण के गठन पर हाईकोर्ट के अधिवक्ता बीच का रास्ता निकालने पर सहमत हैं। उनका मानना है कि यदि अधिकरण का क्षेत्राधिकार भी इलाहाबाद हाईकोर्ट और लखनऊ पीठ के क्षेत्राधिकार की तरह बांट दिया जाए तो इस समस्या का हल निकल सकता है, बशर्ते सभी पक्ष इस पर सहमत हों। निर्णय प्रदेश सरकार को करना है इसलिए उसकी रज़ामंदी सबसे जरूरी है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के क्षेत्राधिकार में प्रदेश के 62 जिले हैं जबकि, लखनऊ पीठ के पास 13 जिलों का क्षेत्राधिकार है। हाईकोर्ट के अधिवक्ता चाहते हैं, यदि इसी के मुताबिक अधिकरण का क्षेत्राधिकार भी बांट दिया जाए तो उनको कोई आपत्ति नहीं है। मगर पूरा अधिकरण अकेले लखनऊ में स्थापित करना न तो न्याय हित में है और न ही वादकारियों के। हाईकोर्ट बार एसोसिएशन का कहना है कि उसने इस सुझाव के साथ राज्य सरकार को प्रस्ताव भी भेजा है मगर, अभी तक सरकार की ओर से कोई निर्णय नहीं लिया गया है।
बार के अध्यक्ष राके श पांडेय का कहना है कि अधिकरण लखनऊ ले जाने के पीछे असल खेल ब्यूराक्रेसी का है। मगर इससे वादकारियों को गंभीर नुकसान होगा। अधिकरण के फैसले के खिलाफ यदि अपील या रिवीजन दाखिल करना है तो उसे फिर इलाहाबाद आना होगा। इससे वादकारी की परेशानी बढ़ेगी। यदि लखनऊ पीठ में ही सभी रिवीजन दाखिल होंगे तो इलाहाबाद हाईकोर्ट के वकीलों का नुकसान होगा। उनके काम का बड़ा हिस्सा छिन जाएगा।
पूर्व अध्यक्ष राधाकांत ओझा प्रस्तावित बिल पर ही सवाल खड़े करते हैं। कहते हैं ट्रिब्यूनल का स्ट्रक्चर ही जनता के हित में नहीं है। इसमें जिला जज और सचिव स्तर के अधिकारी बैठेंगेे। उनका कार्यकाल दो साल का होगा। इसका मतलब है कि जबतक वह शिक्षा कानूनों को समझेंगे, कार्यकाल ही समाप्त हो जाएगा। अधिकरण के बिल में हाईकोर्ट को अपील की अधिकारिता नहीं दी गई है। अपील सुप्रीमकोर्ट में दाखिल होगी जबकि हाईकोर्ट को सिर्फ रिवीजन की अधिकारिता होगा। इससे वादकारियों के लिए न्याय पाने का रास्ता और दुरुह हो जाएगा।
पूर्व अध्यक्ष आईके चतुर्वेदी भी क्षेत्राधिकार बंटवारे पर सहमत हैं मगर, सवाल उठाते हैं कि जो काम इलाहाबाद और लखनऊ पीठ में 20 हाईकोर्ट के जज कर रहे हैं, वह काम ट्रिब्यूनल में कैसे हो पाएगा। यह अलग सवाल है। चतुर्वेदी कहते हैं, अधिकरणों के काम को लेकर वैसे भी कई सवाल हैं। प्रदेश में जितने भी अधिकरण बने हैं, किसी में नियुक्तियां पूरी नहीं हैं। ऐसे में शिक्षा जैसे संवेदनशील मामले के निस्तारण में अधिकरण कितने प्रभावी होंगे इस पर भी विचार की जरूरत है।
हालांकि अधिकरण के मुद्दे पर गेंद अब कोर्ट के पाले में है। जस्टिस सुधीर अग्रवाल के रेफरेंस पर पांच जजों की पीठ के इस मामले पर सुनवाई करने की संभावना है। अधिवक्ता कहते हैं कि अधिकरण से जुड़े इन तमाम मुद्दों को अदालत के समक्ष रखा जाएगा।