आलम यह है कि 153 में से 30-35 वेंटिलेटर से ही काम लिया जा रहा है। बता दें कि कोरोना की दूसरी लहर में हालात काफी बिगड़ गए थे। तब भारत सरकार ने देश में वेंटिलेटर बनाने की जिम्मेदारी भारत इलेक्ट्रॉनिक लिमिटेड को दी थी। इसी कड़ी में एमएलएन मेडिकल कॉलेज को 153 वेंटिलेटर दिए गए थे।
कोरोना काल के दौरान चिकित्सा सुविधा को मजबूत करने के लिए पीएम केयर फंड से लगभग 153 वेंटिलेटर मोती लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज से संबद्ध स्वरूप रानी चिकित्सालय (एसआरएन) भेजे गए थे। हालांकि, कोरोना काल के बाद करीब 80 फीसदी वेंटिलेटर अस्पताल के कोने में डाल दिए गए, जहां पड़े-पड़े ये धूल फांक रहे हैं।
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आलम यह है कि 153 में से 30-35 वेंटिलेटर से ही काम लिया जा रहा है। बता दें कि कोरोना की दूसरी लहर में हालात काफी बिगड़ गए थे। तब भारत सरकार ने देश में वेंटिलेटर बनाने की जिम्मेदारी भारत इलेक्ट्रॉनिक लिमिटेड को दी थी। इसी कड़ी में एमएलएन मेडिकल कॉलेज को 153 वेंटिलेटर दिए गए थे।
वहीं, कोरोना काल के बाद पिछले दो वर्षों से तकरीबन 120 वेंटिलेटर अस्पताल के कोने में पड़े हुए हैं। इसके चलते आधे से ज्यादा वेंटिलेटर के सेंसर और बैटरी खराब हो चुकी है। दरअसल इन वेंटिलेटर को इस्तेमाल न करने का सबसे बड़ा कारण, इनके सपोर्टिंग सिस्टम का कमजोर होना है। चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि ऑक्सीजन सप्लाई के लिए वेंटिलेटर ठीक हैं। मगर गंभीर मरीजों के लिए यह ज्यादा प्रभावी नहीं हैं।
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इसकी वजह से इन्हें इस्तेमाल में नहीं लिया जा रहा है। हालांकि, हाल ही में इन वेंटिलेटर की सर्विस कराने की तैयारी शुरू हो चुकी है। जिसके लिए इन वेंटिलेटर को बनाने वाली भारत इलेक्ट्रॉनिक लिमिटेड संस्था को ऑर्डर भी दे दिया गया है। इसके अलावा संस्था के इंजीनियरों ने पिछले हफ्ते इन सभी वेंटिलेटर का मौका मुआयना किया था और जिन वेंटिलेटर में पार्ट आदि लगने हैं, उनकी लिस्ट बनाकर ले गए थे।
कोविड के समय में जो वेंटिलेटर भारत सरकार से मिले थे, उनसे काम लिया जा रहा है। इसके अलावा उपकरणों की सर्विस का ऑर्डर दे दिया गया है। जिन वेंटिलेटर के पार्ट में समस्या आएगी, उन्हें भी ठीक किया जाएगा। - डॉ. वत्सला मिश्रा, प्राचार्य, मोती लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज