उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सार्वजनिक स्थानों पर अवैध रूप से बनाए जा रहे धर्मस्थलों के निर्माण रोकने के संबंध में सरकार को नीति तय करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने यह भी कहा है कि 29 सितंबर 2009 के बाद सार्वजनिक स्थानों पर बने धर्मस्थलों को एक माह के भीतर हटाया जाए।
अतिक्रमण कर धर्मस्थलों के निर्माण की प्रवृत्ति पर चिंता जाहिर करते हुए कोर्ट ने कहा है कि संविधान ने धर्म को मानने की आजादी दी है मगर इससे किसी को सार्वजनिक स्थान पर अतिक्रमण कर धर्मस्थल बनाने की छूट नहीं मिल जाती है।
प्रदेश सरकार ने सार्वजनिक स्थानों पर बने धर्मस्थलों को नियमित करने की नीति अदालत के समक्ष रखी जिसे मामले की सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति सुनील अंबवानी और न्यायमूर्ति भारत भूषण की खंडपीठ ने अस्वीकार कर दिया।
प्रमुख सचिव गृह को सार्वजनिक स्थानों पर बने धर्मस्थलों का सर्वे कराकर पूरी रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। प्रदेश भर में अवैध रूप से बने धर्मस्थलों की संख्या फोटोग्राफ के साथ प्रस्तुत करनी होगी। अवैध धर्मस्थलों को हटाने की अनुपालन रिपोर्ट देनी होगी।
खंडपीठ ने निर्देश दिया है कि स्कूलों, अस्पतालों, लोक कार्यालयों और अदालतों से सौ मीटर की परिधि में बने अवैध धार्मिक स्थलों को पहले हटाया जाए। प्रमुख सचिव गृह की ओर दाखिल हलफनामे में बताया गया कि 29 सितंबर 2009 से पूर्व प्रदेश में 46181 अवैध निर्माण चिह्नित किए गए थे।
इनमें से 88 हटा दिए गए है और 47 को पुन: स्थापित किया जा रहा है। सरकार 42381 अवैध निर्माणों को नियमित करने जा रही है। खंडपीठ ने इसे नामंजूर करते हुए कहा कि किसी को भी अवैध निर्माण नियमित करने की मांग करने का अधिकार नहीं है।