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अलीगढ़ः जिस जगह जलती है पराली, वहां पर प्रभावित होती है फसल

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आशीष श्रीवास्तव
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पराली व फसल अवशेष जलाने के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय, एनजीटी व शासन की चिंता यूं ही नहीं है। यह पर्यावरण के लिए जहर के समान है। इसकी गंभीरता का अंदाजा इन तथ्यों से लगाया जा सकता है कि एक हजार किलो पराली जलाने से 92 किलो कार्बन मोनो आक्साइड, 1600 किलो कार्बन डाई आक्साइड, 0.4 किलो सल्फर डाई आक्साइड, 4 किलो नाइट्रस आक्साइड, 3 किलो कार्बन व 200 किलो राख निकलती है। इससे पूरा इलाका गैस चैंबर में तब्दील हो जाता है। साथ ही, जिस स्थान पर पराली जलाई जाती है, उस स्थान पर फसल का उत्पादन प्रभावित होता है।
इसके अलावा, पराली जलने से निकलने वाली गैसों से वातावरण में शुद्ध ऑक्सीजन में कमी होने के साथ साथ आंखों में जलन, त्वचा रोग, फेफड़ों की बीमारी, हृदय रोग, एलर्जी आदि बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। कृषि विभाग के मुताबिक, एक बीघे में दो क्विंटल धान पैदा होने पर करीब चार क्विंटल पराली निकलती है।
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जिला कृषि अधिकारी डॉ. रामप्रवेश ने बताया कि फसल अवशेष जलाने से नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटैशियम, सल्फर, सूक्ष्म पोषक तत्व एवं कार्बन की क्षति होती है। पोषक तत्वों के नष्ट होने के अतिरिक्त मिट्टी के कुछ गुण मसलन, भूमि तापमान, पीएच वैल्यू, नमी, उपलब्ध फास्फोरस एवं जैविक पदार्थ भी प्रभावित होते हैं। इसका सीधा असर भूमि की उर्वरा शक्ति पर भी पड़ता है, जिस स्थान पर पराली या फसल अवशेष जलाए जाते हैं, उस स्थान पर फसल का उत्पादन प्रभावित होता है। हरदुआगंज निवासी किसान राजेंद्र ने बताया कि उन्होंने दो साल पहले अपने खेत के छोटे से हिस्से में पराली जलाई थी। उसके बाद मूंगफली की फसल लगाई। निराई व गुड़ाई के बावजूद जिस स्थान पर पराली जलाई थी, वहां मूंगफली का एक भी पौधा नहीं पनपा।
किसानों की ये है मजबूरी
अलीगढ़। दुष्परिणामों से परिचित होने के बावजूद किसानों के पराली सामने बड़ी समस्या होती है। धान की कटाई एवं गेहूं की बुवाई जल्दी ही होती है। किसान के पास खेत की तैयारी में 20 से 30 दिन का समय ही होता है। गेहूं की बुवाई की जल्दबाजी में किसान फसल अवशेष जला देता है।
प्रमोशन आफ एग्रीकल्चर मैकेनाइजेशन फॉर इन सीटू योजना से लगेगी रोक
अलीगढ़। जिला कृषि अधिकारी ने बताया कि पराली जलाने के मामलों की रोकथाम के लिए सरकार ने प्रमोशन आफ एग्रीकल्चर मैकेनाइजेशन फॉर इन सीटू मैनेजमेंट ऑफ क्रॉप रेजीड्यू योजना संचालित की है। यह योजना प्रदेश में पराली के सीटू प्रबंधन के लिए उपयोगी यंत्रों व मशीनों को प्रोत्साहित करने के लिए चलाई जा रही है। इन यंत्रों में सुपर स्ट्रा मैनेजमेंट सिस्टम कंबाइन हार्वेस्टर के साथ प्रयोग किया जाता है। इन यंत्रों के मशीनरी बैंक की स्थापना पर 80 फीसदी अनुदान देय है।
पराली का कैसे करें उपयोग
अलीगढ़। कृषि विभाग के मुताबिक मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की वृद्धि के लिए फसल अवशेषों को रोटावेटर से मिट्टी में मिलाकर 25 किलो यूरिया प्रति एकड़ की दर से छिड़क कर पानी लगा दें। यह पराली सड़कर खाद में तब्दील हो जाएगी। कंबाइन मशीन से कटाई के साथ स्ट्रॉ रीपर अथवा सुपर एसएमएस का अनिवार्य रूप से प्रयोग करें। पराली को ट्रैक्टर चालित कुट्टी मशीन से छोटा-छोटा काटकर बरसीम में मिलाकर पशु को खिला सकते हैं। पराली को एकत्र कर जैविक खाद बनाई जा सकती है। पराली को पशुओं की बिछावन के रूप में भी प्रयोग किया जा सकता है।
वर्जन
पराली प्रबंधन के लिए कंट्रोल रूम स्थापित किया गया है। इसका नंबर 05712742581 है। किसान पराली जलाने की जानकारी दे सकते हैं। पराली प्रबंधन के लिए प्रयुक्त होने वाले कृषि यंत्र सुपर सीडर, जीरो टिल सीड ड्रिल, मल्चर आदि को किराये पर लेने की जानकारी भी प्राप्त कर सकते हैं।
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- डॉ. रामप्रवेश, जिला कृषि अधिकारी
ये हैं तथ्य
एक हजार किलो पराली जलाने से 92 किलो कार्बन मोनो आक्साइड, 1600 किलो कार्बन डाई आक्साइड, 0.4 किलो सल्फर डाई आक्साइड, 4 किलो नाइट्रस आक्साइड, 3 किलो कार्बन व 200 किलो राख निकलती है।
ये होती है समस्या
- शुद्ध ऑक्सीजन में कमी के साथ ही आंखों में जलन, त्वचा रोग, फेफड़ों की बीमारी, हृदय रोग, एलर्जी आदि बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है।
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