17 अक्तूबर को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के संस्थापक सर सैयद अहमद खान की 204वीं जयंती है। विश्वविद्यालय के जनसंपर्क विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर और साहित्य एकेडमी पुरस्कार विजेता प्रोफेसर शाफे किदवई की सर सैयद अहमद पर लिखी पुस्तक रीजन, रिलिजन एंड नेशन प्रकाशित हुई है। इस किताब में सर सैयद का उनकी आलोचनाओं से बचाव नहीं किया गया है, बल्कि इसमें वह तस्वीर सामने लाने की कोशिश की गई है, जिसमें सर सैयद ने भारतीय जनमानस के सामूहिक जीवन को प्रभावित किया।
प्रोफेसर किदवई सर सैयद की भूमिका को एक अधिकारी, एक प्रशासक, एक विधायिका का व्यक्ति और भारतीय जनमानस के जीवन में मूलभूत बदलाव लाने वाले व्यक्ति के रूप में देखते हैं। वह कहते हैं, सर सैयद की समाज के प्रति अहम भूमिका सन 1860 में देखने को मिलती है, जब अकाल के समय वह राहत कार्य में लगे हुए थे। उनके प्रयासों से रेलवे में यात्री प्रतीक्षालय, कैंटीन, बैठने के लिए शेड और अन्य सुविधाओं का विस्तार हुआ।
सर सैयद ने कई तरह के रूढ़िवादी तत्वों से किया संघर्ष
एएमयू में अंग्रेजी विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर आसिम सिद्दीकी इस किताब की समीक्षा करते हुए लिखते हैं, इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल का सदस्य होने के नाते सर सैयद अहमद ने कई तरह के रूढ़िवादी तत्वों के साथ संघर्ष किया। 1882 में वह एक वैक्सीनेशन बिल लेकर आए। इसके अलावा उन्होंने देश के नियमन के कोडिफिकेशन की भी आवाज उठाई। इल्बर्ट बिल को लेकर भी उनका समर्थन इतिहास में दर्ज है। इसमें ब्रिटिश आरोपियों के खिलाफ भारतीय जज आपराधिक मामलों की सुनवाई कर सकते थे। सर सैयद की विभिन्न भूमिकाओं को ब्रह्म समाज और आर्य समाज ने भी सराहा। 25 जनवरी 1884 को वह लाहौर में दयानंद सरस्वती से मिले। जब-जब सर सैयद ने राष्ट्र शब्द का जिक्र किया, तब तब उनके राष्ट्र की परिभाषा में हिंदू और मुसलमान व सभी धर्मों के लोग शामिल थे।
सर सैयद कहते थे जिहाद की धारणा भारत के लिए नहीं है
इस किताब के हवाले से प्रोफेसर आसिम सिद्दीकी लिखते हैं कि सांस्कृतिक बहुलतावाद में सर सैयद का पूरा विश्वास था। वह कहते थे कि सच्चा धर्म यह शिक्षा नहीं देता कि किसी दूसरे धर्म का अनादर किया जाए। उन्होंने गो हत्या से धार्मिक मतावलंबियों को दूर रहने की अपील की थी। सर सैयद अहमद एक जगह लिखते हैं कि जिहाद की धारणा भारत में लागू नहीं की जा सकती। इसके अलावा, मुस्लिम समुदाय की तरक्की के संबंध में उनका मानना था कि आरक्षण पूरी तरह से इस समस्या का समाधान नहीं करेगा।
हालांकि, राजनीतिक विचारक जॉन स्टुअर्ट मिल से प्रभावित वह यह जरूर मानते थे कि चुनाव के माध्यम से बहुसंख्यक, अल्पसंख्यकों पर अपनी इच्छा थोप सकते हैं। इसलिए उनके हितों की रक्षा के लिए नौकरी में आरक्षण हितों की पूर्ति करने में सहायक सिद्ध हो सकता है। पुस्तक के माध्यम से पता लगता है कि 1890 के बाद इंडियन नेशनल कांग्रेस को लेकर उनका विरोध ठंडा पड़ने लगा था। इसी के साथ उन्होंने मोअम्डन एजुकेशनल कांग्रेस का भी आयोजन किया।
अंग्रेज भारत के उन मूल्यों को धारण नहीं कर सके, जो उनसे बेहतर थे
एएमयू के पूर्व प्रोफेसर इफ्तिखार आलम खान के हवाले से प्रोफेसर किदवई कहते हैं, अगर सर सैयद थोड़ा और जीवित रहते तो वह निश्चित रूप से इंडियन नेशनल कांग्रेस में शामिल होते। हाथ मिलाकर अभिवादन करने की प्रथा को वह पश्चिमी तरीका नहीं मानते थे। उनका यह मानना था कि एक शताब्दी से भी अधिक समय तक भारत में रहने के बाद अंग्रेज भारत के उन मूल्यों और गुणों को धारण नहीं कर सके हैं, जो उनसे बेहतर हैं।