सन 1886 में अकाल के खत्म होने के बाद अनाजों के दामों में कमी की उम्मीद थी। लेकिन इस दौर में चांदी के दाम में वैश्विक कमी दर्ज की गई थी। इसी काल में रूस में युद्ध छिड़ गया था। अंग्रेजी प्रतिभूतियों में मंदी देखने को मिली थी। दोनों के सम्मिलित प्रभाव से अनाजों के दामों में बढ़ोतरी देखी गई। 1888-1897 के दशक के आखिरी दो वर्षों में फसलें अच्छी नहीं गईं। दशक में गेहूं 14.91 सेर प्रति रुपया, जौ 21.38 सेर प्रति रुपया, ज्वार 19.12 सेर प्रति रुपया और बाजरा 17.17 सेर प्रति रुपया रहे थे। 1897-1906 के दशक में भी अनाज के दाम कमोबेश इसी तरह रहे। जिले में अरहर और चना भी ठीकठाक मात्रा में उगाई जाती थी। हालांकि इनके दामों को लेकर अंग्रेजों ने ज्यादा रिकार्ड नहीं रखा।
मजदूरी की दर भी जान लें
ज्ञात इतिहास के मुताबिक खेतिहर मजदूरों को मजदूरी अनाज के रूप में मिला करती थी। अंग्रेजी शासनकाल में भी यह प्रथा कायम रही। यह मोटे अनाजों के रूप में ढाई से तीन सेर प्रति दिन थी। दयानतदारी में लोग मजदूरों को कंबल और कपड़े भी दे देते थे। जहां तक मुद्रा में सन 1800 से लेकर 1850 तक अकुशल मजदूरी का सवाल था, वह औसतन चार पैसे प्रति दिन थी। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद मजदूरी बढ़कर छह पैसे प्रति दिन हो गई। अकुशल मजदूरी की दर पूरे मेरठ संभाग में 1878 में आठ पैसे और 1909 तक यह बढ़कर 10 से 12 पैसे हो गई थी।
कुशल श्रमिकों की बात करें तो उसकी मजदूरी उसके कौशल पर निर्भर करती थी। एक बढ़ई या लोहार को 1858 तक आठ से दस पैसे प्रति दिन तक मिलते थे। 1874 तक उनकी मजदूरी तीन आने से लेकर चार आने (12 से 16 पैसे) तक हो गई थी। 1900 तक कुशल मजदूरी पांच से छह आने प्रति दिन की थी। अंग्रेजों ने 1906 में मजदूरी पर एक सर्वे कराया था। इसका नतीजा था कि अलीगढ़ और हाथरस में कुशल मजदूरों को अन्य जिलों की अपेक्षा ठीकठाक मजदूरी मिला करती थी। ताला और लौह भट्ठियों में काम करने वाले मजदूरों, लोहारों और मिस्त्री को 15 से 18 रुपये प्रति माह तक मिला करते थे। उद्योगों में काम करने वाला फिटर 35 से 45 रुपये प्रति माह तक पाता था। रोचक बात यह भी मजदूरी की यह दर संयुक्त प्रांत (वर्तमान में उत्तर प्रदेश) के प्रमुख औद्योगिक शहरों कानपुर और आगरा से भी ज्यादा थी।
जारी...
स्रोत- अलीगढ़ का गजेटियर (1878-1909)