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अतीत का अलीगढ़ 15: कभी एक रुपये का 39 सेर गेहूं और 46 सेर चना मिलता था अलीगढ़ में, अनाजों के दाम चौंका देंगे

Thu, 14 Dec 2023 10:47 PM IST
चमन शर्मा कुमार अतुल, अमर उजाला, अलीगढ़

सार

राज्य सरकार ने एक शासनादेश के जरिए प्रदेश के सभी जिलों के लिए नया जिला गजेटियर तैयार करने का आदेश दिया है। उसके लिए कमेटियों का गठन किया जा रहा है। अलीगढ़ का अंतिम गजेटियर 1909 में तैयार किया गया था। लगभग 400 पेजों की इस पुस्तक में लगभग 114 साल पुराने अलीगढ़ के भूगोल, नदियों, प्रशासनिक व्यवस्था, सिंचाई व ड्रेनेज सिस्टम, पुलिस व्यवस्था आदि के बारे में विस्तार से वर्णन है। इस संबंध में अतीत का अलीगढ़ नाम से एक समाचार श्रृंखला शुरू की जा रही है। उम्मीद है कि पुराने अलीगढ़ के बारे में जानकारी पाठकों को रुचिकर लगेगी। कृपया अपनी राय से हमें अवगत कराएं।
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अतीत का अलीगढ़ - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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बहुत से लोगों को अलीगढ़ जिले की मंडियों और बाजारों में दो सौ साल पहले अनाजों के दाम जानकर हैरानी होगी। सबसे पहले तो यह जान लें कि अनाजों की बिक्री सेर में हुआ करती थी। एक सेर किलो से थोड़ा कम लगभग 960 ग्राम का होता था। जिले में अनाज के दामों का सबसे पहला रिकार्ड सन 1812 में मिलता है।  

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ब्रिटिश शासनकाल के दस्तावेज बताते हैं कि उस दौर में एक रुपये का 39 सेर गेहूं और 46 सेर चना मिलता था।  सन 1813 में फसलों के लिए अनुकूल परिस्थिति नहीं थी। इस साल गेहूं के दाम एक रुपये में 23.5 सेर और चना के दाम 23.75 सेर प्रति रुपया हो गया था। 1837 के ठीक पहले अकाल पड़ा था। इस वजह से अनाजों के भाव बढ़े थे। हालांकि औसत दामों में मामूली बढ़ोतरी ही हुई थी। इस दौरान गेहूं एक रुपये का 33.5 सेर, जौ एक रुपये का 44.2 सेर, ज्वार एक रुपये का 48.4 और बाजरा एक रुपये का 40 सेर मिला करता था।

1857-58 के दशक में अनाज के दाम काफी गिरे थे
सन 1857-58 के दौरान अलीगढ़ जिले में अनाज के दाम काफी गिर गए थे। गेहूं कभी एक रुपये में लगभग 23 सेर का हो गया था लेकिन 1857-58 में गेहूं के दाम एक रुपये में 38.3 सेर, जौ एक रुपये का 55.5 सेर, ज्वार एक रुपये में 49.8 सेर और बाजरा 48.4 सेर प्रति रुपया हो गया था। एक सेर 80 तोले का होता था। एक तोला लगभग 12 ग्राम का होता था। सन 1800 से लेकर 1850 के ब्रिटिश काल में अनाजों के दामों में कोई खास बढ़ोतरी नहीं देखी गई। अनाज के दामों में बढ़ोतरी 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद हुई। इस व्यापक आंदोलन का असर खेती पर भी देखा गया था। बहुत से किसान इससे जुड़े थे। 1858-1867 के दशक में गेहूं का औसत दाम एक रुपये का 25.6 सेर, जौ 34.12 सेर प्रति रुपया, ज्वार 29.91 सेर प्रति रुपया, बाजरा 28.25 सेर प्रति रुपया था। अनाजों के दामों में औसतन वृद्धि 49 फीसदी की रही।
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1867-1876 के दशक में अनाज उत्पादन में बढ़ोतरी के बाद भी दाम बढ़े थे
सन 1867-1876 के दशक में जिले में अनाज उत्पादन बढ़ा था। इसके बाद भी हालात की अनिश्चितताओं की वजह से अनाज के दाम में वृद्धि देखने को मिली थी। गेहूं के दाम बढ़कर 19.1 सेर प्रति रुपया, जौ 27.06 सेर प्रति रुपया, ज्वार 24.23 सेर प्रति रुपया और बाजरा 22.07 सेर प्रति रुपया हो गए थे।

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चांदी के दाम में गिरावट से अनाजों के दाम भी बढ़े थे

सन 1886 में अकाल के खत्म होने के बाद अनाजों के दामों में कमी की उम्मीद थी। लेकिन इस दौर में चांदी के दाम में वैश्विक कमी दर्ज की गई थी। इसी काल में रूस में युद्ध छिड़ गया था। अंग्रेजी प्रतिभूतियों में मंदी देखने को मिली थी। दोनों के सम्मिलित प्रभाव से अनाजों के दामों में बढ़ोतरी देखी गई। 1888-1897 के दशक के आखिरी दो वर्षों में फसलें अच्छी नहीं गईं। दशक में गेहूं 14.91 सेर प्रति रुपया, जौ 21.38 सेर प्रति रुपया, ज्वार 19.12 सेर प्रति रुपया और बाजरा 17.17 सेर प्रति रुपया रहे थे। 1897-1906 के दशक में भी अनाज के दाम कमोबेश इसी तरह रहे। जिले में अरहर और चना भी ठीकठाक मात्रा में उगाई जाती थी। हालांकि इनके दामों को लेकर अंग्रेजों ने ज्यादा रिकार्ड नहीं रखा।

मजदूरी की दर भी जान लें
ज्ञात इतिहास के मुताबिक खेतिहर मजदूरों को मजदूरी अनाज के रूप में मिला करती थी। अंग्रेजी शासनकाल में भी यह प्रथा कायम रही। यह मोटे अनाजों के रूप में ढाई से तीन सेर प्रति दिन थी। दयानतदारी में लोग मजदूरों को कंबल और कपड़े भी दे देते थे। जहां तक मुद्रा में सन 1800 से लेकर 1850 तक अकुशल मजदूरी का सवाल था, वह औसतन चार पैसे प्रति दिन थी।  1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद मजदूरी बढ़कर छह पैसे प्रति दिन हो गई। अकुशल मजदूरी की दर पूरे मेरठ संभाग में 1878 में आठ पैसे और 1909 तक यह बढ़कर 10 से 12 पैसे हो गई थी।

कुशल श्रमिकों की बात करें तो उसकी मजदूरी उसके कौशल पर निर्भर करती थी। एक बढ़ई या लोहार को 1858 तक आठ से दस पैसे प्रति दिन तक मिलते थे। 1874 तक उनकी मजदूरी तीन आने से लेकर चार आने (12 से 16 पैसे) तक हो गई थी। 1900 तक कुशल मजदूरी पांच से छह आने प्रति दिन की थी। अंग्रेजों ने 1906 में मजदूरी पर एक सर्वे कराया था। इसका नतीजा था कि अलीगढ़ और हाथरस में कुशल मजदूरों को अन्य जिलों की अपेक्षा ठीकठाक मजदूरी मिला करती थी। ताला और लौह भट्ठियों में काम करने वाले मजदूरों, लोहारों और मिस्त्री को 15 से 18 रुपये प्रति माह तक मिला करते थे। उद्योगों में काम करने वाला फिटर 35 से 45 रुपये प्रति माह तक पाता था। रोचक बात यह भी मजदूरी की यह दर संयुक्त प्रांत (वर्तमान में उत्तर प्रदेश) के प्रमुख औद्योगिक शहरों कानपुर और आगरा से भी ज्यादा थी। 
जारी... 
स्रोत- अलीगढ़ का गजेटियर (1878-1909)
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