प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2022 से पहले ही ब्राह्मण समुदाय की आगामी रणनीति को लेकर बहस छिड़ी है। बहस इस बात की है कि ब्राह्मण समुदाय का रुझान क्या रहेगा..? इसको लेकर प्रदेश के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य, शासन-प्रशासन की कार्रवाई, स्थानीय जातिगत आंकड़े, नेताओं के प्रभाव का लगातार आकलन हो रहा है। बसपा और सपा में इस समुदाय को अपने साथ लाने की प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई है।
बसपा के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा ने बीती 26 जुलाई से प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलनों की शुरूआत अयोध्या से कर इसकी शुरूआत की है। बीती तीन अगस्त को वह अलीगढ़ आए और इस समुदाय के लोगों को बसपा के साथ सरकार बना कर खोया सम्मान वापस पाने की अपील की। वह प्रदेश के भ्रमण पर हैं। बसपा ने वर्ष 2007 के चुनाव में इसी फंडे को अपना कर सरकार बनाई थी। अब दोबारा से वही फार्मूला लगाया जा रहा है।
बसपा के इस दांव को भांप कर सपा ने भी छोटे लोहिया के नाम से मशहूर स्व. जनेश्वर मिश्र की जयंती पांच अगस्त पर पूरे प्रदेश में साइकिल दौड़ा कर ब्राह्मण समुदाय को आकर्षित करने का प्रयास किया है। अलीगढ़ में सपा नेताओं के बीच भीड़ जुटाने की जबरदस्त होड़ देखने को मिली।
इसी तरह से कांग्रेस ने हाल ही में अनुशासनहीनता में निष्कासित नेता विनोद पांडेय को पार्टी में वापस लिया। स्थानीय स्तर पर ब्राह्मण समुदाय को सकरात्मक संदेश दिया गया। भाजपा पर इसका कितना असर होगा..? ये तो आने वाले विधानसभा चुनाव में पता चलेगा। स्थानीय स्तर पर भाजपा से सांसद सतीश गौतम, कोल विधायक अनिल पाराशर, राजेश भारद्वाज माहिर ब्राह्मण नेता के तौर पर जाने जाते हैं। ऐसे स्थानीय विपक्ष ब्राह्मणों को अपने खेमे में लाने में कितना सफल होगा। इस पर सभी की नजरें लगी हैं।