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अतीत का अलीगढ़ 21 : अलीगढ़ में कभी खुलेआम दुकानों से बेची जाती थी अफीम और भांग

Thu, 28 Dec 2023 04:30 PM IST
चमन शर्मा कुमार अतुल, अमर उजाला, अलीगढ़

सार

राज्य सरकार ने एक शासनादेश के जरिए प्रदेश के सभी जिलों के लिए नया जिला गजेटियर तैयार करने का आदेश दिया है। उसके लिए कमेटियों का गठन किया जा रहा है। अलीगढ़ का अंतिम गजेटियर 1909 में तैयार किया गया था। लगभग 400 पेजों की इस पुस्तक में लगभग 114 साल पुराने अलीगढ़ के भूगोल, नदियों, प्रशासनिक व्यवस्था, सिंचाई व ड्रेनेज सिस्टम, पुलिस व्यवस्था आदि के बारे में विस्तार से वर्णन है। इस संबंध में अतीत का अलीगढ़ नाम से एक समाचार श्रृंखला शुरू की जा रही है। उम्मीद है कि पुराने अलीगढ़ के बारे में जानकारी पाठकों को रुचिकर लगेगी। कृपया अपनी राय से हमें अवगत कराएं।
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अतीत का अलीगढ़ - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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अलीगढ़ जिले में मदिरा पर व्यवस्थित ढंग से कर अंग्रेजी प्रशासन के वजूद में आने पर ही लगाया गया था। 1804 से लेकर 1861 के बीच मदिरा और दूसरे नशे की वस्तुओं से जो कर वसूला जाता था उसे आबकारी महाल कहा जाता था। इस दौर में शायद ही कोई कल्पना करे कि अफीम जैसे मादक पदार्थ की बिक्री धड़ल्ले से दुकानों के जरिए हो। अंग्रेजी प्रशासन में न सिर्फ अफीम खुलेआम बिकती थी बल्कि उसके लिए लाइसेंस भी जारी किया जाता था। इसके अलावा स्पिरिट वाली मदिरा और भांग भी बाकायदा ठेका उठाकर बेची जाती थी।

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इन मादक पदार्थों के उत्पादन और बिक्री पर अंग्रेजी प्रशासन ने कर लगाया था। इसके लिए ठेकेदारों को अनुमतिपत्र दिए जाते थे। यह ठेके परगनावार दिए जाते थे। ऐसा भी होता था कि एक ठेकेदार एक से ज्यादा परगनों की आबकारी का लाइसेंस हासिल कर लेता था। आबकारी महकमे में ठेकेदार ही आबकारी उत्पादों की गुणवत्ता के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार था। पूरे जिले में आबकारी महकमा सिर्फ पांच कर्मचारियों तक सीमित था। शुरुआती दौर में एक दरोगा और चार चपरासी ही थे।

जिले के लोग थोड़ी-थोड़ी ही पीया करते थे
मौजूदा समय में शराब की 484 और भांग की सात दुकानों से आबकारी महकमे से सालाना 73 करोड़ 31 लाख रुपये की आमदनी होती है। 1851-1852 के दौरान शराब से आबकारी विभाग को होने वाली औसत सालाना आमदनी 14600 रुपये थी। अफीम से होने वाली सालाना आय 2600 रुपये और अन्य मादक पदार्थों से होने वाली सालाना आमदनी 4330 रुपये थी। लेकिन अंग्रेजों ने अपनी रिपोर्टों में आबकारी महकमे के गठन के वक्त की आय को कम और सीमित बताया। इसका अर्थ साफ था कि जिले में मदिरा के शौकीन लोगों की संख्या कम थी। अलबत्ता, अफीम और भांग के शौकीन लोग भी थे। अंग्रेज अफीम के बड़े शौकीन बताए जाते थे। लेकिन हैरत की बात यह है कि उन्होंने अपने शासकीय दस्तावेजों में मुस्लिम की सभी जातियों और हिंदुओं की कई जातियों को अफीम का शौकीन लिखा। कुश्ती के शौकीनों और अखाड़ों के बीच भांग बहुत लोकप्रिय थी।

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1882 में अफीम की खेती पर लगा था प्रतिबंध, गाजीपुर की फैक्टरी से खरीदते थे ठेकेदार 

जिले में अफीम की न सिर्फ बिक्री होती थी, बल्कि थोड़ी-बहुत मात्रा में अफीम के पौधे की खेती भी होती थी। लेकिन इसकी खेती पर 1882 ईस्वी में प्रतिबंध लगा दिया गया। अफीम बेचने वाले ठेकेदारों को गाजीपुर की सरकारी अफीम फैक्टरी से सीधे अफीम खरीदनी होती थी। 1876-77 में जिले में अफीम की सालाना औसत खपत 69.5 मन की थी। एक मन में 40 किलो हुआ करता था। 1896-97 में अफीम की खपत बढ़कर 76. 5 मन हो गई थी। अफीम से निकाली गई चरस की बिक्री भी थोड़ी बहुत होती थी।

अलीगढ़, हाथरस, सिकंदराराऊ और अतरौली में खोली गई थी शराब फैक्टरी 
अंग्रेजों ने अलीगढ़, हाथरस, सिकंदराराऊ और अतरौली में शराब बनाने की फैक्टरियां खोली थीं। 1881 में अतरौली की शराब फैक्टरी बंद कर दी गई। हाथरस और सिकंदराराऊ की शराब फैक्टरियां 1882 में बंद की गईं। इसके तीन साल बाद 1884 में अलीगढ़ स्थित शराब की फैक्टरी भी बंद कर दी गई। जिले की सभी शराब फैक्टरियों को बंद करके यहां मेरठ और अन्य जिलों में बनी शराब की आपूर्ति शुरू की गई। 1876-77 के दौर को अंग्रेजों ने शराब के लिहाज से मुफीद करार दिया। इसी साल शराब की दुकानों के लाइसेंस फीस में वृद्धि की गई। शराब की ड्यूटी और लाइसेंस फीस से कुल मिलाकर आबकारी महकमे को 18058 रुपये सालाना की आमदनी हुई थी। जिले में बिकने वाली ज्यादातर शराब देशी फैक्टरियों में बनी थी। विदेशी मदिरा की बिक्री बेहद कम होती थी। इससे सालाना सिर्फ 952 रुपये ही थी। ताड़ी और सेंधी भी चलन में थी। इसे ताड़ के पेड़ों से निकाला जाता था। 
जारी... 
स्रोत- अलीगढ़ का गजेटियर (1878-1909)
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