जिले में अफीम की न सिर्फ बिक्री होती थी, बल्कि थोड़ी-बहुत मात्रा में अफीम के पौधे की खेती भी होती थी। लेकिन इसकी खेती पर 1882 ईस्वी में प्रतिबंध लगा दिया गया। अफीम बेचने वाले ठेकेदारों को गाजीपुर की सरकारी अफीम फैक्टरी से सीधे अफीम खरीदनी होती थी। 1876-77 में जिले में अफीम की सालाना औसत खपत 69.5 मन की थी। एक मन में 40 किलो हुआ करता था। 1896-97 में अफीम की खपत बढ़कर 76. 5 मन हो गई थी। अफीम से निकाली गई चरस की बिक्री भी थोड़ी बहुत होती थी।
अलीगढ़, हाथरस, सिकंदराराऊ और अतरौली में खोली गई थी शराब फैक्टरी
अंग्रेजों ने अलीगढ़, हाथरस, सिकंदराराऊ और अतरौली में शराब बनाने की फैक्टरियां खोली थीं। 1881 में अतरौली की शराब फैक्टरी बंद कर दी गई। हाथरस और सिकंदराराऊ की शराब फैक्टरियां 1882 में बंद की गईं। इसके तीन साल बाद 1884 में अलीगढ़ स्थित शराब की फैक्टरी भी बंद कर दी गई। जिले की सभी शराब फैक्टरियों को बंद करके यहां मेरठ और अन्य जिलों में बनी शराब की आपूर्ति शुरू की गई। 1876-77 के दौर को अंग्रेजों ने शराब के लिहाज से मुफीद करार दिया। इसी साल शराब की दुकानों के लाइसेंस फीस में वृद्धि की गई। शराब की ड्यूटी और लाइसेंस फीस से कुल मिलाकर आबकारी महकमे को 18058 रुपये सालाना की आमदनी हुई थी। जिले में बिकने वाली ज्यादातर शराब देशी फैक्टरियों में बनी थी। विदेशी मदिरा की बिक्री बेहद कम होती थी। इससे सालाना सिर्फ 952 रुपये ही थी। ताड़ी और सेंधी भी चलन में थी। इसे ताड़ के पेड़ों से निकाला जाता था।
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स्रोत- अलीगढ़ का गजेटियर (1878-1909)