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अलीगढ़ः स्वतंत्रता आंदोलन के यज्ञ में अलीगढ़ के सेनानियों ने दी आहुति

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दीपक शर्मा
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स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में अलीगढ़ और अलीगढ़ के स्वतंत्रता सेनानियों की अहम भूमिका रही है। इतिहास में दर्ज विवरण के आधार पर अगर बात की जाए तो 1857 के विद्रोह में अलीगढ़ के लोगों के शामिल होने का इतिहास में तो कोई विवरण नहीं मिलता है, लेकिन इस संबंध में किवदंतियां बहुत हैं। कुछ स्थानीय लेखकों ने लिखा है, लेकिन वह किस आधार पर लिख रहे हैं, इसका कोई जिक्र नहीं है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की इतिहास विभाग की प्रोफेसर शीरीन मूसवी कहती हैं कि अलीगढ़ में स्वतंत्रता की लहर से पहले वैज्ञानिक दृष्टिकोण शिक्षा और सामाजिक सुधार के क्षेत्र में पहल हुई और यह काम सर सैयद ने किया।
1864 के आसपास साइंटिफिक सोसायटी की स्थापना की, जिसके सदस्य राजा जयकिशन दास भी थे। बाद में कॉलेज भी स्थापित किया। इसके अलावा महिला शिक्षा के लिए शेख अब्दुल्ला ने पहल की और कॉलेज खोला। 1920 के बाद अलीगढ़ में स्वतंत्रता आंदोलन की तपन अनुभव की जाने लगी थी। 1925 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय छात्र संघ द्वारा महात्मा गांधी को छात्र संघ की आजीवन सदस्यता दिए जाने के बाद यहां पर राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भाग लेने वालों की संख्या बढ़ गई। जवाहरलाल नेहरू के करीबी अब्दुल मजीद ख्वाजा, मोहनलाल गौतम जैसे लोगों ने यहां राष्ट्रीय आंदोलन की कमान संभाली।
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जिस प्रार्थना सभा में बापू को गोली लगी उसमें मौजूद थे छर्रा के बिहारी लाल
अलीगढ़। छर्रा के गांव रुखाला में रहने वाले बिहारीलाल आजीवन अविवाहित रहे। 1941 में छर्रा में सत्याग्रह किया। 1 वर्ष की जेल और 14000 रुपये जुर्माना अदा करने की सजा हुई। बिहारी लाल को जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री व्यक्तिगत रूप से जानते थे। जिस प्रार्थना सभा में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को गोली मारी गई उस प्रार्थना सभा में बिहारीलाल भी मौजूद थे। सरकार द्वारा दी जाने वाली 16000 रुपये की पेंशन और 12 बीघा जमीन के सहारे उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी गुजार दी।
काकोरी कांड में हुई थी मोहनलाल गौतम की गिरफ्तारी
आजादी के आंदोलन का मशहूर काकोरी कांड की स्मृतियां अलीगढ़ से जुड़ी हुई हैं। अलीगढ़ के स्वतंत्रता सेनानी मोहनलाल गौतम काकोरी कांड में गिरफ्तार कर लिए गए थे। 5 अगस्त 1902 को अलीगढ़ के वीरपुरा गांव में पैदा हुए मोहनलाल गौतम किशोरावस्था से ही स्वतंत्रता के आंदोलन में कूद पड़े थे। असहयोग आंदोलन के दौरान वह शाहजहांपुर, लखीमपुर खीरी, लाहौर भी गए। वह पंजाब केसरी लाला लाजपत राय के संपर्क में रहे और सर्वेंट ऑफ पीपुल सोसाइटी के सदस्य भी बने। यहीं पर मोहनलाल राजऋषि पुरुषोतम दास टंडन के संपर्क में भी आए। महात्मा गांधी के अहिंसक नेतृत्व में जुड़कर नमक सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाई और जेल गए।
शहीदे आजम भगत सिंह ने काटी थी अलीगढ़ में फरारी
भगत सिंह काकोरी कांड को अंजाम देने के बाद टप्पल के गांव शादीपुर में ठाकुर टोडर सिंह के यहां एक शिक्षक के रूप में रहे थे। यहीं पर बालक हरिशंकर उनके संपर्क में आए जो बाद में चलकर स्वतंत्रता सेनानी हरिशंकर आजाद के रूप में जाने गए। जिस समय हरिशंकर आजाद भगत सिंह से मिले उस समय उनकी उम्र 9 वर्ष थी। बाद में हरी शंकर आजाद ने चंद्रशेखर आजाद से प्रेरित होकर अपने नाम के साथ आजाद जोड़ लिया। सत्याग्रह, असहयोग आंदोलन, सहित भारत छोड़ो आंदोलन और कई आंदोलनों में भाग लिया और जेल गए।
भगत सिंह की फांसी की खबर वाला अखबार लेकर अलीगढ़ आए श्याम बिहारी लाल
1931 में जब लाहौर की सेंट्रल जेल में भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी की सजा दी गई तब इलाहाबाद से निकलने वाले एक अखबार भविष्य ने इस खबर को अपने प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित किया। अंग्रेज सरकार नहीं चाहती थी कि फांसी की खबर आम जनता तक पहुंचे, इसलिए अखबारों के प्रसार पर कड़े पहरे लगा दिए गए । अलीगढ़ के रहने वाले श्याम बिहारी लाल की ये जिम्मेदारी थी कि वह इलाहाबाद से अखबारों की प्रतियां लेकर अन्य शहरों में पहुंचाएं। उन्होंने इस काम को बखूबी अंजाम दिया। अखबार की 50 प्रतियां लेकर वह अलीगढ़ भी आए। वह अखबार आज भी आईटीआई रोड पर रहने वाले श्याम बिहारी लाल के बेटे निरंजन लाल के पास सुरक्षित रखा हुआ है। 2005 में श्याम बिहारी लाल की मृत्यु हो गई। इन अखबारों की सुर्ख़ियों से पता लगता है कि दुनिया ने भगत सिंह की फांसी को किस अंदाज में जाना होगा।
स्वतंत्रता मिलने पर टल गई थी कैप्टन अब्बास अली की फांसी
एएमयू के मिंटू सर्किल स्कूल के छात्र रहे आजाद हिंद फौज के कैप्टन अब्बास अली अपनी आखिरी सांस तक यही कहते थे कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु प्लेन दुर्घटना में नहीं हुई। क्योंकि इस हादसे के बाद उन्होंने खुद उनका संबोधन सुना था। अंग्रेजों से लड़ाई हार जाने के बाद कैप्टन अब्बास अली को मुल्तान के किले में कैद कर लिया गया था और उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई थी, लेकिन इस बीच नेहरू और माउंटबेटन के बीच समझौता हुआ और सभी राजनीतिक बंदियों की रिहाई का रास्ता साफ हुआ। इसके चलते ही कैप्टन अब्बास अली रिहा हुए।
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अलीगढ़ के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी
आफताब अहमद, बिहरी लाल, हरिशंकर आजाद, कैप्टन अब्बास अली, कुंवर नेत्रपाल सेनानी, ठाकुर मलखान सिंह, मोहनलाल गौतम, नवाब सिंह, धर्मवीर सिंह।

मोहनलाल गौतम सबसे बाएं, गोविंद बल्लभ पंत व अन्य स्वतंत्रता सेनानियों के साथ।- फोटो : CITY OFFICE

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