एएमयू के पूर्व जनसंपर्क अधिकारी डॉ. राहत अबरार ने बताया कि वर्ष 1981 में एएमयू संस्थान अल्पसंख्यक स्वरूप की बहाली के बाद वर्ष 2004 में मनमोहन सिंह की सरकार की ओर से एक पत्र में कहा गया कि यह अल्पसंख्यक संस्थान है, इसलिए वह अपनी दाखिला नीति में परिवर्तन कर सकता है। तत्कालीन केंद्र सरकार की अनुमति के बाद विश्वविद्यालय ने एमडी-एमएस के विद्यार्थियों के लिए प्रवेश नीति बदलकर आरक्षण प्रदान किया। यूनिवर्सिटी के खिलाफ पीड़ित डॉ. नरेश अग्रवाल व अन्य उच्च न्यायालय इलाहाबाद चले गए। एकल पीठ का फैसला विवि के खिलाफ आया। युगल पीठ का फैसला भी विवि के खिलाफ था। उसके बाद विवि ने उच्चतम न्यायालय की शरण ली, जहां आदेश दिया गया कि जब तक कोई सुबूत नहीं मिलता, तब तक यथा स्थिति बनी रहेगी, लेकिन भाजपा सरकार ने एएमयू पक्ष में दाखिल हलफनामे को चुनौती दी।
पैनल की उठी मांग
एएमयू के अल्पसंख्यक दर्जे को लेकर बुलाई गई बैठक में कुलपति पैनल की मांग उठी। साथ ही कुछ शिक्षकों को उनके विभाग को संबोधित करके बुलाया गया था, जबकि वह शिक्षक संघ अध्यक्ष और सचिव हैं। इसको लेकर भी मुद्दा उठा।