भाजपा ने जिले की सातों सीटों पर फिर वापसी कर भगवागढ़ बरकरार रखा है। गुरुवार को मतगणना के बाद साफ हो गया इस चुनाव में विरोध व मुद्दे सब गायब रहे और ध्रुवीकरण के सहारे भाजपा को लगातार दूसरी प्रचंड जीत मिली है। हालांकि, मतदान से पहले विपक्ष के सियासी दिग्गजों ने मतदाताओं को पुकार कर खूब रिझाने का प्रयास किया। मगर मतदाताओं ने उनकी पुकार को दरकिनार कर सपा-रालोद, बसपा, कांग्रेस सबका पत्ता साफ कर दिया। इस दौरान जिले के जाटलैंड और मिनी छपरौली कहे जाने वाले इगलास व खैर क्षेत्र में जयंत का भी जादू काम नहीं किया। इन परिणामों को देख सभी विपक्षी हैरान हैं।
जिले की शहरी आबादी वाली दो शहर व कोल पर सीट पर तमाम नाराजगी और पेचीदगियों के बावजूद ध्रुवीकरण ने भगवागढ़ बरकरार है। इसी तरह जाटलैंड की खैर व इगलास सीट के जाटों पर भी इस बार भगवा जादू कायम रहा। इसी तरह पूर्व मुख्यमंत्री स्व.कल्याण सिंह की पैतृक सीट अतरौली पर कल्याण सिंह बिना हुए पहले चुनाव में जनता ने उनकी सियासी विरासत संभाल रहे उनके पौत्र को फिर वही प्यार दिया है।
इसी तरह ठाकुर बहुल बरौली में जिले के सियासी दिग्गज ठा.जयवीर सिंह ने पार्टी और अपने कद के दम पर भगवा फराया है। जिले की दूसरी ठाकुर बहुल छर्रा पर भी उसी ध्रुवीकरण और जातीय समीकरण के दम पर भाजपा विधायक ने फिर वापसी दर्ज की है। खास बात है कि सातों नवनिर्वाचित विधायकों एक लाख से अधिक मत लाकर जीत दर्ज की है और ध्रुवीकरण का ही परिणाम है कि सपा के शहर व कोल सीट के हारे हुए प्रत्याशी भी एक-एक लाख से अधिक मत पाकर हारे हैं।
शहर : पार्टी की तरह जनता ने भी ‘राजा’ का रखा मान
शहर सीट पर मतदान में ध्रुवीकरण का कितना असर रहा। यह परिणाम से साफ दिखाई दे रहा है। कुल मिलाकर जिस तरह टिकट देने में भारतीय जनता पार्टी ने निर्वतमान विधायक संजीव राजा का मान रखा। उसी तरह जनता ने भी उनके इस मान का ध्यान रखा है। पहले तो पार्टी ने सजायाफ्ता होने के बाद संजीव राजा के हाईकोर्ट से जुड़े फैसले का इंतजार किया। जब देर होने लगी तो किसी भी अन्य दावेदार को दरकिनार कर उनकी पत्नी मुक्ता संजीव राजा को मैदान में उतारा। खुद उसी दिन संजीव राजा ने यह स्वीकार लिया था कि वे और उनकी आने वाली पीढ़ियां पार्टी का ये कर्ज नहीं उतार पाएंगी। टिकट देने के लिए इंतजार करना और फिर बिना किसी सवाल के पत्नी को टिकट देकर पार्टी ने उन्हें विधायक मान लिया है। उसी तरह ध्रुवीकरण के दम पर शहर के मतदाताओं ने भी उनकी पत्नी को भरपूर मत देकर जीत दिलाई है। खास बात है कि इस बार भी उनके सामने सपा के जफर आलम मैदान में थे। दोनों में सीधी टक्कर हुई है। जैसा माना जा रहा था कि बसपा व कांग्रेस के प्रत्याशी इन दोनों के मतों में सेंधमारी कर किसी को नुकसान पहुंचाएंगे। मगर वैसा नहीं हुआ। मतगणना के समय साफ दिख रहा था कि कैसे अपने-अपने इलाकों में दोनों प्रत्याशी लगातार बढ़त बनाए हुए हैं। बाकी कोई मैदान में नहीं हैं और जीत का सेहरा मुक्ता राजा के सिर बंधा।
कोल : एकजुटता की चुनौती को भी पार कर गए पाराशर
2017 के चुनाव में सपा कांग्रेस गठबंधन के बावजूद अज्जू इशहाक व विवेक बंसल अलग-अलग चुनाव लड़े। इसके बाद बसपा से रामकुमार शर्मा मैदान में थे और सपा के बागी के रूप में जमीरउल्लाह ताल ठोके हुए थे। इस बिखराव के बीच मोदी लहर में भाजपा के नए चेहरे के रूप में अनिल पाराशर ने उस चुनाव में जब जीत दर्ज की तो तर्क गढ़े गए कि बिखराव की वजह से यह सीट भाजपा ने जीती है। मगर इस बार तस्वीर इसके विपरीत थी। सपा से सलमान शाहिद के बदले फिर पुराने चेहरे के रूप में अज्जू मैदान में थे तो जमीर उल्लाह उन्हें कंधे से कंधा मिलाकर चुनाव लड़ा रहे थे। विवेक बंसल कांग्रेस से ताल ठोक रहे थे तो बसपा छोड़ रामकुमार शर्मा विवेक बंसल के साथ खड़े थे। बसपा से मुस्लिम चेहरा मो.बिलाल मैदान में थे। इस बार एकजुटता के चलते बदली हुई परिस्थितियों में भाजपा के लिए चुनाव बेहद चुनौतीपूर्ण माना जा रहा था। मगर परिणाम फिर भी वही आए। हां, जीत का अंतर जरूर बहुत कम हुआ। इस दौरान ध्रुवीकरण का आलम परिणाम के समय सिर चढ़कर बोला, एक इलाके में जब मतों की गिनती चली तो भाजपा की सांसें अटकी रहीं और जब भाजपा का गढ़ गिनती के नंबर पर आया तो सपा को हार का सामना करना पड़ा।
बरौली : जयवीर ने कराया अपने सियासी कद का अहसास
कहने को जिले के कद्दावर सियासी चेहरे पूर्व मंत्री पिछले दो बार से बरौली सीट पर चुनाव हारे हैं। मगर, वे निकटतम प्रतिद्वंद्वी रहे और दोनों बार उनका वोटों का आंकड़ा 80 हजार के आसपास रहा। चूंकि इस बार उनके सामने उनके सियासी विरोधी दलवीर सिंह चुनाव मैदान में नहीं थे और बागी, भीतराघाती उन्हें चुनौती देने का प्रयास कर रहे थे। इस सबके बीच उन्होंने अपने सियासी कद का अहसास कराते हुए जिले में सबसे बड़ी जीत दर्ज की है। खास बात यह है कि जिस बसपा से अब तक जयवीर सिंह 80 हजार के आसपास वोट पाते आए हैं। उसी बसपा के प्रत्याशी को उन्होंने 60 हजार के भीतर समेट कर रख दिया। यानि साफ है कि वे अकेले बसपा के बेस वोट के दम पर बरौली से दो बार चुनाव नहीं जीते थे, बल्कि उनका अपना सियासी रसूख और चुनाव मैनेजमेंट था। इसी चुनाव मैनेजमेंट व सियासी रसूख का उन्होंने अहसास कराया।
अतरौली : बाबूजी के बाद अतरौली ने दिया संदीप को प्यार
जिस सीट से सूबे के मुख्यमंत्री रहे भाजपा के कद्दावर नेता और प्रदेश में भाजपा को खड़ा करने वाले अग्रिम पंक्ति के नेताओं में शामिल स्व. कल्याण सिंह दस बार विधायक जीते। उस सीट पर इस बार भी उनके पौत्र ने जीत दर्ज की है। हालांकि पिछले वर्ष कल्याण सिंह के देहांत के बाद तरह तरह के कयास लगाए जा रहे थे। एक गुट कहता था कि सहानुभूति में सीट परिवार ही जीतेगा तो एक गुट कहता था कि अब बाबूजी वाला लगाव लोगों का नहीं रहा। इसी सियासी उठापटक के बीच खुद संदीप व उनके एटा सांसद पिता राजवीर सिंह ने अतरौली में जमकर प्रचार किया। मुख्यमंत्री, गृह मंत्री तक की सभाएं कराईं। उपमुख्यमंत्री ने जनसंपर्क किया। अंत समय तक तरह तरह के कयास लगाए जाते रहे। मगर अतरौली की जनता ने संदीप को वही प्यार दिया, जो दादा के समय पिछली बार दिया था। इस बार भी वे पिछले चुनाव की तरह अच्छे अंतर से चुनाव जीते हैं। उनके सामने सपा के वीरेश उसी आंकड़े पर सिमट कर रह गए।
इगलास : तो जाटों ने चुकाया राजा महेंद्र प्रताप के नाम का कर्ज
2017 के चुनाव में निर्वाचित भाजपा विधयाक राजवीर दिलेर के सांसद निर्वाचित होने के बाद 2019 के उपचुनाव में जीते राजकुमार सहयोगी को लेकर जाटों के बीच खासा विरोध सुर्खियों में रहा। इसके अलावा किसान आंदोलन, आवारा गोवंश, विकास, महंगाई, बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर दो बार इगलास क्षेत्र में आए जयंत चौधरी ने जाटों को एकजुट करने का प्रयास किया और कसमें तक खिलाईं। तमाम तरह की उलाहनाएं भी भाजपा के प्रति दीं। मगर जाटों ने भाजपा द्वारा जाट नेता राजा महेंद्र प्रताप के नाम पर राज्य विश्वविद्यालय की घोषणा और स्थापना का कर्ज इगलास में फिर सहयोगी को जिताकर चुकाया है। दूसरा बड़ा कारण इस सीट पर भी ध्रुवीकरण व जातीय समीकरण माना जा रहा है। कुल मिलाकर मिनी छपरौली के रूप में विख्यात इस सीट पर जयंत चौधरी द्वारा चौ.चरण सिंह के सहारे रिश्ता जोड़ने का प्रयास नाकाफी साबित हुआ है।
खैर : अबकी टिकट वितरण ने लगाई भाजपा की नैय्या पार
खैर सीट पर जाटों के बीच किसान आंदोलन, आवारा गोवंश, महंगाई, खेती किसानी से जुड़े मुद्दे तो हावी थे ही। साथ में विधायक की लोगों से दूरी भी नाराजगी का एक बड़ा कारण थी। इस सबके बीच चुनाव से पहले तक रालोद को लेकर बड़ा शोर मचा हुआ था। मगर रालोद ने इस सीट पर पूर्व विधायक को चुनाव मैदान में उतारकर जाटों की नाराजगी मोल ले ली। इसके बाद से ही जाटों में समर्थन को लेकर तरह-तरह के गुणा भाग लगाया जाने लगा। बस इसी गुणा भाग का भाजपा विधायक ने लाभ उठाया। मान-मनुहार के बीच खुद की नैय्या पार लगाई। साथ में सांसद सतीश गौतम का सर्वाधिक खैर में समय देना भी उनकी जीत का बड़ा कारण बना है। कुल मिलाकर यहां जातिय ध्रुवीकरण के साथ-साथ मुद्दों के बिना चुनाव हुआ है।
छर्रा : नया चेहरा भी न दिखा पाया कमाल, जातीय समीकरण हावी
जिले की दूसरी ठाकुर बहुल छर्रा सीट पर सपा ने इस बार जातीय समीकरण बैठाते हुए नए चेहरे के रूप में लक्ष्मी धनगर को चुनाव मैदान में उतारा। हालांकि नए चेहरे के मैदान में आने के बाद से ही इलाके से विरोधी स्वर उठने लगे थे। जिसका खुद के प्रति नाराजगी के बीच विधायक रवेंद्रपाल ने लाभ उठाने का प्रयास किया। साथ में इस क्षेत्र में सभा करने आए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी लोगों को सपा के समय की याद दिलाई। अपने कार्यकाल के काम गिनाए और बस इसी समीकरण के दम पर रवेंद्रपाल का काम बना और वे पहले की तरह से अच्छे अंतर से चुनाव जीते हैं।