अतरौली के वैसपाड़ा मोहल्ले के मूल निवासी मेराज खां ने 25 साल पहले ससुर के आशीर्वाद से लड्डूगोपाल के ऐसे दीदार किए कि आज देवी-देवताओं का कारोबार बुलंदी छूने लगा है। सासनीगेट क्षेत्र में कारखाना चलाने वाले मेराज खां को उनके ससुर बुंदू खां ने सन 1996 में अतरौली से मोटर मैकेनिक का काम छुड़वाकर यहां बुलाया था।
जयगंज सराय भूकी निवासी बुंदू खां भगवान की प्रतिमाओं में जान डालने जैसे कार्य को काफी सालों से करते चले आ रहे हैं। मेराज के कारखाने में ढलाई के बाद लड्डूगोपाल, राधा-कृष्ण और अन्य मूर्तियों की बैल्डिंग, रेताई, पॉलिश और चिताई (आकृतियों को उभारना) का काम होता है।
30 अगस्त को धूमधाम से जन्माष्टमी मनाई जाएगी। इसके उपलक्ष्य में अमर उजाला टीम ने बुधवार को बाजारों में मिल रहे कान्हा और लड्डूगोपाल को मूर्त रूप देने वाले कारखानों का दौरा किया। इस दौरान सासनीगेट के कासिम नगर लड़िया मोहल्ले में स्थित एक कारखाने से सांप्रदायिक सौहार्द की तस्वीर देखने को मिली।
यहां मेराज खां के कारखाने में तकरीबन 12 कारीगर धड़ाधड़ लड्डूगोपाल और राधा-कृष्ण की प्रतिमाओं को मूर्त रूप दे रहे थे। मेराज खां से बात की तो उन्होंने बताया कि आज से 25 साल पहले 1996 में उनके ससुर बुंदू खां अतरौली से मोटर मैकेनिक का काम बंद करवाकर यहां लेकर आए थे। इससे पहले उनकी पुत्री आबिदा खातून से मेराज खां का निकाह 1991 में हुआ था।
मेराज ने बताया कि उन्होंने 2001 तक ससुर के साथ काम किया। इसके बाद उन्होंने कहा कि जाओ अपने पैरों पर खड़े हो जाओ। उनसे अलग हटकर छोटा सा कारखाना खोला और कुछ मजदूरों के सहयोग से ढलाई के बाद लड्डू गोपाल की मूर्तियों की बैल्डिंग (गैस), रेताई, पॉलिश और चिताई (आकृति उभारना) का काम करने लगे।
ससुर ने 25 साल पहले जो लड्डूगोपाल और भगवान की मूर्तियों का दीदार कराया यानी कि काम सिखाया। आज उन्हीं लड्डूगोपाल की वजह से कारोबार फल फूल रहा है। बातों-बातों में मेराज कह भी उठते हैं कि सब लड्डू गोपाल की कृपा है।
अब सालाना का कारोबार 20 लाख रुपये टर्नओवर तक पहुंच गया है। मेराज मसूदाबाद स्थित आर एंड पी एक्सोपर्टर कंपनी का ही माल बनाते हैं। किसी और का माल बनाने की जरूरत ही नहीं पड़ती है। जबकि इस कारोबार में मेराज के बड़े बेटे 28 वर्षीय जाविद खान और 20 वर्षीय सुबोर खान भी हाथ बंटाते हैं।
पिछले तीन महीने पहले से ही शुरू हो गई जन्माष्टमी की धूम
मेराज खां ने बताया कि लॉकडाउन और ऑफ सीजन की वजह से काम नहीं था, लेकिन जैसे ही विगत महीने लॉकडाउन खुला तो जन्माष्टमी की रौनक दिखाई देने लगी। उन्होंने बताया कि पिछले 24 सालों में इतने लड्डूगोपाल नहीं बनाए थे।
जितने इस बार जून, जुलाई और अगस्त के महीने में बनाए हैं। तकरीबन छह टन माल बना चुके हैं। इनमें लड्डूगोपाल, राधा-कृष्ण की मूर्तियां ही हैं। लड्डूगोपाल तो एक किलो, डेढ़ किलो, तीन, पांच, सात, दस और 14 किलो के बनाए गए। जबकि कुछ लड्डूगोपाल 25 किलो के भी बनाए थे।
वृंदावन-मथुरा में खपत, कलकत्ता का पता नहीं
बता दें कि अलीगढ़ ने पिछले कई सालों में मूर्तियों के कारोबार में काफी पैर पसारे हैं। यूं तो पूरे देश में लड्डूगोपाल और राधा-कृष्ण की मूर्तियां पहुंचाई जाती हैं, लेकिन सबसे अधिक मथुरा-वृंदावन में कारोबार होता है। वहीं इससे कहीं ज्यादा कोलकाता में डिमांड बढ़ी है। वहां कितनी मूर्तियां जाती हैं, इसका अनुमान लगाना सरल नहीं है।
अब ढलाई भी कराते हैं
मेराज ने बताया कि उन्होंने ढलाई की भठ्ठियां नहीं लगवाई हैं, लेकिन कुछ मजदूरों को तय कर रखा है। जिनके यहां पीतल पहुंचाई जाती है और तोल के हिसाब से ढलाई कराई जाती है। बाकी का कार्य कारखाने में होता है।
अपने कारखाने में तैयार हुए लड्डूगोपाल दिखाते मेराज खां। -राजा तिवारी- फोटो : CITY OFFICE