अलीगढ़। गोपाल दास नीरज की पंक्तियां हैं, न जन्म कुछ न मृत्यु कुछ बस इतनी सिर्फ बात है, किसी की आंख खुल गई किसी को नींद आ गई। दो जनवरी भी अलीगढ़ के लिए कुछ ऐसी ही मिश्रित भावना लेकर आती है। अलीगढ़ के कौडियागंज में जन्मे साहित्यकार जैनेंद्र ने अपनी प्रतिभा और क्षमता से साहित्य को समृद्ध किया और अलीगढ़ को बौद्धिकता के क्षेत्र में नई ऊंचाइयां प्रदान कीं। दूसरी ओर 2 जनवरी को नाटककार सफदर हाशमी को 1989 में हमने खो दिया। अलीगढ़ के वामपंथी समुदाय में वह बेहद लोकप्रिय थे और अलीगढ़ से उनका लगातार आना-जाना बना रहता था।
प्रसिद्ध गजलकार सुरेश कुमार कहते हैं कि कौड़ियागंज में जन्मे जैनेंद्र ने मनोवैज्ञानिक साहित्य रचने में बहुत महारत हासिल की। नए तरह की लेखन शैली और विश्लेषण ने उनकी पहचान बनाई। सुरेश कुमार कहते हैं कि अलीगढ़ की साहित्य बिरादरी की ओर से उन्हें प्यार और सम्मान मिलता रहा। वह अलीगढ़ में आयोजित होने वाले साहित्यिक कार्यक्रमों में याद किए जाते रहे। उनके पुत्र प्रदीप कुमार यहां एक प्रकाशन संस्था का भी संचालन करते थे।
दूसरी ओर सफदर हाशमी को याद करते हुए सुरेश कुमार कहते हैं कि 2 जनवरी 1989 को वह अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के आर्ट फैकल्टी लॉज में एक कार्यक्रम में शामिल हुए थे। उसी समय यह सूचना मिली के सफदर हाशमी का उपचार के दौरान निधन हो गया है। इससे कुछ दिन पहले ही उन पर एक नाटक के मंचन के दौरान हमला किया गया था, जिसमें वह बुरी तरह घायल हो गए थे। उनके ऊपर यह दबाव था कि वह नाटक का मंचन न करें।
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के मामलों के जानकार डॉ. राहत अबरार कहते हैं कि सफदर हाशमी कला की दुनिया के एक बड़ा नाम हैं। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में ऐसे कई वरिष्ठ शिक्षक हैं, जिनके वह रिश्तेदार थे। इस नाते से उनका विश्वविद्यालय में भी अक्सर आना-जाना होता था। वह विश्वविद्यालय में भी छात्रों में विशेष रूप से लोकप्रिय थे।