आज महिलाओं को आत्मरक्षा की ट्रेनिंग दी जा रही है लेकिन ब्रज में यह काम सैकड़ों वर्ष पहले ही शुरू हो चुका था। गुलामी के दौर में पुरुषों ने ब्रज ललनाओं को भी लाठी चलाना सिखाया। आगे चलकर यही लाठी लट्ठमार बन गई।
ब्रज साहित्य की पुस्तकों में इसी तरह का उल्लेख मिलता है। द्वापर के होली साहित्य में कहीं भी लट्ठमार के पद, गीत नहीं हैं। यह परंपरा 16वीं सदी के आसपास शुरू हुई मानी जाती है।
लठामार होली नंदगांव और बरसाने ही नहीं बल्कि ब्रज के कई गांवों में अलग-अलग दिन होती है। जाव बठैन में भी होरी पर लाठी चलती है।
साहित्यकार स्व. गोपाल प्रसाद व्यास ने अपने लेख ब्रज की रंगीली होली में लट्ठमार के इतिहास का वर्णन किया है। लेख के अनुसार गुलामी के दौर में महिलाएं सुरक्षित नहीं थी। ऐसे में ब्रज के पुरुषों ने महिलाओं को लाठी चलाने में निपुण किया।
ब्रिटिश काल में मथुरा के कलेक्टर रहे ग्राउस ने लठामार को कृत्रिम युद्ध लिखा है। नारियों ने अपने बल का प्रदर्शन कर यह जता दिया कि कोई भी उनकी तरफ आंख उठाएगा तो ‘मार मार लट्ठ धूर कर आए’ का दिन देखना पड़ेगा।
महिलाओं की इस लाठी का दम अब भी लट्ठमार होली पर नजर आता है। जब कोई राह से गुजरने वाला उनसे कुछ कहता है, तो उस पर लाठी चल पड़ती है।