नगला नाथू निवासी मीरा देवी ने बताया कि यमुना किनारे मिर्च की खेती करके व गाय, बकरी का दूध बेचकर अपने घर को चला रहीं थीं। यमुना का पानी बढ़ने लगा तो सारा सामान लेकर ऊंचे स्थान पर पहुंच गए। दो रात न हम सोए न ही बच्चे। यमुना का पानी उतरा तो अपने घरों में सामान लेकर पहुंचे। घर उजड़ा हुआ और फसलें बर्बाद मिलीं। हमने घर को तो साफ करके ठीक कर लिया। लेकिन, बर्बाद हुई मिर्च की फसल देखकर समझ नहीं आ रहा कि किससे क्या मदद मांगे।
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बकरियां बह गईं, दाना सड़ गया
रियासउद्दीन ने बताया कि 10 साल पहले रॉयल गोट फॉर्म के नाम से बकरी फार्म खोला था। अचानक बाढ़ का पानी आया और 10 से 14 बककियां भी बह गईं। बाकी बकरियों को लेकर शुक्रवार को अपने फॉर्म में लेकर लौटे तो बकरियों का सारा चारा, जौ, मक्का सड़ चुका था। इतना पैसा भी नहीं है कि एक बार फिर से पहले की तरह सब शुरू कर लें।
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बाढ़ में जान तो बच गई , लेकिन सब कुछ तो बर्बाद हो गया। खेती कर अपना घर चलाते थे। वह भी नहीं बची। न ही गाय, बकरियां बचीं। सामान तो हमारे पास ज्यादा नहीं था। जो कुछ भी था वह हमारी फसल थी। इससे हमारा घर चलता था। हमारे लिए तो कोई भी सहारा नहीं है।
-तेजपाल सिंह, किसान
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प्रशासन की ओर से नहीं मिला सहयोग
प्रशासन की तरफ से कोई भी सहयोग नहीं मिला। गोशाला छोड़ टीले वाले हनुमान मंदिर पर पिछले एक हफ्ते से गायों के साथ रह रहे हैं। गायों के लिए एक तिरपाल का भी इंतजाम नहीं किया। यमुना का पानी उतरने पर यमुना से फैली कीचड़ भी खुद ही साफ कर रहे हैं।
-अवधेश पंडित ( मां रेणुका गौसेवा धाम, संचालक)
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श्मसान घाट से यमुना का पानी तो निकल गया, लेकिन कीचड़ के कारण शवों की अंत्येष्टि करने में दिक्क्तों का सामना करना पड़ रहा है। प्रधान की ओर से कीचड़ साफ करवाने का काम नहीं कराया जा रहा है।
-गुड्डू, देखरेखकर्ता (पोइया घाट, श्मसान)