15 बसों की हालत बदतर, फिर भी दौड़ रहीं
मथुरा डिपो की 84 बसें और 37 अनुबंधित बसें हैं। इनमें केवल छह बसें 10 साल से कम अवधि की है, जबकि 74 बसें 12 से 15 साल पुरानी हैं। इनमें 15 बसों की हालत तो बदतर हो रही है। फिर भी बसों को दौड़ाया जा रहा है। परिवहन निगम को सवारियों की जान की कतई चिंता नहीं है। यह बसें ऐसी हैं कि रास्ते में खड़ी हो जाती हैं। ऐसा कई बार हो भी चुका है।
उसके बाद इन कंडम बसों को मार्गों से हटाया तक नहीं गया है। एआरएम नरेश चंद गुप्ता ने बताया कि बसों की स्थिति खराब नहीं है। समय-समय पर इन बसों को वर्कशॉप में दुरुस्त करा लिया जाता है। अनुबंधित बसों का रख-रखाव उसके मालिक करते हैं। समय-समय पर इन बसों की हालत वह खुद भी चेक करते हैं।
बसों में नहीं है अग्निशमन यंत्र
परिवहन निगम की या अनुबंधित बसों में अग्निशमन यंत्र तक नहीं है। अगर हैं भी तो यह काम नहीं करते हैं। ऐसा ही कुछ पुराने बस अड्डे पर बस में लगी आग के बाद हुआ। बस में लगा अग्निशमन यंत्र ने काम नहीं किया। इसके अलावा फर्स्ट एड बॉक्स भी इन बसों में नहीं होता है, जबकि यह होना जरूरी है। परिवहन निगम की बसों में यह कहीं भी नहीं मिलता है।
फिटनेस प्रमाण पत्र से लेने से पहले इन बसों में यह सभी जरूरत की चीजें उपलब्ध रहती हैं। उसके बाद यह गायब हो जाती हैं। खासकर एआरटीओ कार्यालय से इन बसों को बिना देखे भी इन्हें फिटनेस प्रमाण पत्र भी दे दिया जाता है। इसमें एआरटीओ कार्यालय की लापरवाही भी साफ दिखती है। मुख्य अग्निशमन अधिकारी प्रमोद शर्मा ने बताया कि एआरटीओ को कई बार इन बसों को चेक करने के लिए वह पत्र लिख चुके हैं। अग्निशमन यंत्र आदि कमियां पूरी न होने पर इन्हें फिटनेस प्रमाण पत्र नहीं दिया जाए।