मैनपुरी। महिला के लिए खेतीबाड़ी करना आसान नहीं है। बच्चों के भरणपोषण के लिए यह जिम्मेदारी केवल एक मां ही उठा सकती है। गांव रठेरा निवासी कौशल्या देवी ने पति की मौत के बाद तीन बच्चों को काबिल बनाने के लिए न केवल रसोई की जिम्मेदारी निभाई, बल्कि खेतों में धूप और बरसात के बीच काम करके बच्चों को काबिल बनाया।
दन्नाहार थाना क्षेत्र के गांव रठेरा निवासी सुभाष चंद्र की मौत शादी के छह साल बाद ही हो गई। उस समय बेटा दुष्यंत चार साल, बेटी रीना तीन साल और आरती एक वर्ष के पालन पोषण की चुनौती पत्नी कौशल्या देवी पर आ गई। युवावस्था में ही पति की मौत ने कौशल्या के सामने पहाड़ जैसा बोझ खड़ा कर दिया। पर उसने बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली। संकल्प लिया कि बच्चों को काबिल बनाना है। उन्होंने खेतों पर तेज धूप और बरसात के बीच काम किया। फसलों की नराई गुड़ाई के साथ सिंचाई के लिए खेतों में फावड़ा चलाया। बड़े बेटे दुष्यंत कुमार और बेटी रीना कुमारी को बीएड की डिग्री हासिल कराई। मां की मेहनत सफल हुई। दुष्यंत ने 72 हजार शिक्षक भर्ती में शिक्षक की नौकरी हासिल की। बड़ी बेटी रीना की धूमधाम के साथ शादी कर दी। छोटी बेटी आरती को बीटीसी कराई। वर्तमान में वह टेट परीक्षा पास कर शिक्षक भर्ती की तैयारी कर रही है।
मां की परवरिश से ही मिलती है सफलता
वर्तमान में बच्चे नौकरी और व्यस्तता के कारण मां का ख्याल नहीं रख पा रहे हैं। बच्चों को मां के त्याग और शक्ति को पहचानना चाहिए। मां की सेवा के लिए हर संभव तैयार रहना चाहिए। परवरिश का ही परिणाम है कि उन्हें सफलता मिली है।
श्री देवी राजपूत, पूर्व प्रधानाचार्य
अपनी खुशियां करनी पड़ती है दफन
मां वो देवी है जो बच्चों की खुशी के लिए अपनी खुशियों को दफन कर देती है। एक मां ही है जो बच्चों को प्यार देने के साथ ही उनके लिए नेक रास्ता तैयार करती है। हमें मां के त्याग और सेवा को कभी नहीं भूलना चाहिए।
साधना गुप्ता, पूर्व चेयरमैन
मां की उम्मीदों पर ना फिरने दें पानी
मां खुद गीले में सोती है और अपने बच्चों को सूखे में सुलाने का कार्य करती है। मां खुद भूखी रहती है बच्चों को अच्छा भोजन खिलाती है। मां खुद फटे कपड़ों में रह लेती है लेकिन बच्चों को अच्छी ड्रेस उपलब्ध कराती है। मां की उम्मीदों पर पानी नहीं फेरना चाहिए।
मनोरमा देवी, चेयरमैन