ललित की मौत 22 मार्च 2006 को हुई थी। ध्रुव ने ताजगंज थाना में हत्या का केस दर्ज कराया। ललित के ससुर जगदीश प्रसाद शर्मा, सास शिवरानी, साले पंकज उर्फ बॉबी, राहुल शर्मा, अमित शर्मा, अनिल शर्मा, अन्य रिश्तेदार मूलचंद, विजय शर्मा को नामजद कराया।
इन पर पिस्टल से गोली मारकर हत्या का आरोप लगाया। सभी जेल भेजे गए। बॉबी को छोड़कर अन्य को जमानत मिल गई। छह अक्तूबर 2009 को शिवरानी और मूलचंद को छोड़कर अन्य को सेशन कोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुना दी। ये लोग अपील में हाईकोर्ट गए।
इनकी पैरवी करने वाले वकील अकलंक जैन, वीपी सिंह धाकरे और जितेंद्र सिसौदिया ने बताया कि उच्च न्यायालय ने सभी छह आरोपियों को बरी कर दिया। बॉबी साढ़े 13 साल से ही जेल में बंद है। वो जब जेल गया था, तब उसकी उम्र 27 साल थी, अब 40 है। विवेचना दरोगा संजय जायसवाल, आरके मिश्रा ने की। विवेचना का पर्यवेक्षण सीओ राजेश कुमार पांडेय ने किया।
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उच्च न्यायालय ने सीओ राजेश कुमार पांडेय और दरोगा संजय जायसवाल पर कार्रवाई कर चार माह में रिपोर्ट भेजने के आदेश एसएसपी को दिए हैं। आदेश के अनुपालन के लिए जिला जज, डीजीपी, आईजी को भी लिखा है। उच्च न्यायालय ने टिप्पणी की है कि यह कार्रवाई इसलिए जरूरी है ताकि जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता बनी रहे।
डॉक्टर तक का बयान दर्ज नहीं किया
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि विवेचक ने उस उपाध्याय नर्सिग होम के डॉक्टर तक का बयान दर्ज नहीं किया जिसने ललित पाराशर का उपचार किया था। जो ड्राइवर राजेंद्र थाने में मीमो (सूचना) ले गया, उसका भी बयान दर्ज नहीं किया गया। न घटनास्थल के आस पास के लोगों से बात की गई, न ही बॉबी की कॉल डिटेल निकलवाई।