मान बैठे थे रंजिश
तब गांव के संभ्रांत लोगाें के कहने की वजह से शिकायत नहीं की। आरोपियों को माफ कर दिया था। मगर, वो रंजिश मान रहे थे। वारदात वाले दिन विश्वदीप अपने चचेरे भाई अरुण की काॅलोनी से लौट रहा था। तभी उन्हें सगे मनोज, दुर्गेश, दिनेश और भानु प्रताप के साथ उनके पिता राजवीर, वैशाखी और सौरभ यादव 4-5 अज्ञात लोगों ने रोक लिया।
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