केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की 10वीं की परीक्षा में कई छात्र-छात्राएं ऐसे हैं जो किसी वजह से उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाए। वहीं कुछ छात्र परिणाम में सुधार चाहते हैं उनके लिए मई में होने वाली बोर्ड की परीक्षा बेहतर विकल्प है।
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि अभिभावक परीक्षा में अंकों को सफलता का पैमाना न मानें और न ही अपने बच्चे की तुलना दूसरे बच्चों से करें। ऐसा करने से बच्चे अवसाद में जा सकते हैं। इसके बजाय उनका उत्साहवर्धन करें जिससे वह परिणाम सुधार सकें।
हर साल बोर्ड परीक्षा का परिणाम घोषित होने के बाद मनमाफिक परिणाम न आने पर बड़ी संख्या में छात्रों को निराशा घेर लेती है। कई बार स्वास्थ्य या अन्य कारणों से भी बच्चे बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाते। ऐसे में अभिभावकों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। मनोवैज्ञानिकों की मानें तो अंक किसी भी बच्चे की मेधा या प्रतिभा का आकलन नहीं करते।
ऐसे तमाम उदाहरण हैं जहां बोर्ड में सामान्य प्रदर्शन करने वाले छात्र-छात्राएं कॅरिअर में शीर्ष स्थानों तक पहुंचे। अभिभावकों को परिणाम के बाद बच्चे के व्यवहार पर नजर रखनी चाहिए। कई बार संवेदनशील बच्चे भावनाओं में बहकर खुद को नुकसान पहुंचा लेते हैं।
मंडलीय मनोविज्ञान केंद्र के मनोवैज्ञानिक डॉ. जितेंद्र यादव बताते हैं कि प्रतियोगी परीक्षा में प्रतिभाग करने के लिए न्यूनतम अंक इसीलिए निर्धारित किए गए हैं ताकि बच्चों पर अतिरिक्त बोझ न पड़े। होली पब्लिक स्कूल के प्रबंध निदेशक संजय तोमर कहते हैं कि अब तो बोर्ड भी छात्रों को दूसरा मौका दे रहा है। अगर किसी छात्र को लगता है कि उसका परिणाम मनमाफिक नहीं आया तो वह मई में दोबारा परीक्षा दे सकता है।