बर्ड फ्लू के डर से कबूतरों की परवाज रुक गई है। कुलकुलबाजी (कबूतरबाजी) के उस्ताद फिलहाल कबूतरों को ऊंची उड़ान पर भेजने से परहेज कर रहे हैं। इनके कबूतरों की दुनिया अब पिंजरे से छत और छत से पिंजरे तक सिमट गई है। इन दिनों होने वाले कुलकुलबाजी के मुकाबलों पर भी ब्रेक लगा है। उस्तादों का कहना है कि कुलकुलबाजी तो बाद में भी हो जाएगी, यह एहतियात बरतने का समय है। खुद की हिफाजत भी करनी है और कबूतरों की भी।
नाई की मंडी, गालिबपुरा, सदर भट्ठी, मीरा हुसैन, ढोलीखार, शाहगंज, कमाल खां, गोकुलपुरा, फव्वारा, हींग की मंडी, राजश्री टाकीज समेत 20 से ज्यादा इलाकों में लोग घरों में कबूतर पालते हैं। किसी के पास 100 तो किसी पर 500 तक कबूतर हैं।
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सर्दी के इस मौसम में मकर संक्रांति के आसपास जैसे ही धूप निकलती है, कुलकुलबाजी के मुकाबले शुरू हो जाते हैं। गोकुलपुरा के कबूतरबाज बंटी यादव और बलि गुरु ने बताया कि इन दिनों बर्ड फ्लू के कारण कबूतरों की उड़ान बंद कर रखी है। उन पर नजर रख रहे हैं, अगर किसी में लक्षण मिला को डॉक्टर से जांच कराएंगे।
दाने के साथ जड़ी बूटियां और बादाम
गोकुलपुरा के उस्ताद बन्ने मियां ने बताया कि सर्दियों में कबूतरों को सर्दी से बचाने के लिए जड़ी बूटियां जैसे जावित्री, लौंग, पीपल, अगरकटा और बादाम जैसी चीजें दी जा रही हैं।
भरते थे कई किमी लंबी उड़ान
राजश्री टाकीज निवासी उस्ताद दिनेश यादव ने बताया कि अब पक्षियों में फ्लू के कारण कबूतरों को उड़ान पर नहीं भेजा जा रहा है। वैसे सुबह और शाम ये कई किलोमीटर लंबी उड़ान भरते थे।
कंबलों से कवर करते हैं इनके दड़बे
45 साल से कबूतर पाल रहे उस्ताद कमरुद्दीन बताते हैं कि कबूतरों की देखभाल बच्चे की तरह करनी होती है। इन्हें सर्दियों में काजू, बादाम, पिस्ता दिया जाता है। लौंग का पानी पिलाते हैं। सर्दी ज्यादा है और बीमारी भी फैली है, फिलहाल इन्हें ज्यादा उड़ाया नहीं जा रहा है।
ये सावधानी बरतें
कबूतरों के दड़बों के चारों तरफ रोजाना चूने का छिड़काव करें, कबूतरों को पानी में थोड़ा सा पोटेशियम परमेंगनेट (लाल दवा) डालकर दें, नए कबूतर को नहीं खरीदें, अन्य पक्षियों को भी कबूतरों के पास नहीं आने दें, यह वायरस हवा से हवा में फैलने का खतरा है, इसलिए कबूतर नहीं उड़ाएं, कबूतरों को घर में तैयार दाना ही खिलाएं। (जैसा पक्षी विशेषज्ञ डॉ. एके दौनेरिया ने बताया)