40 साल बाद चुनाव मैदान से बाहर हुए अमरचंद
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चुनाव के मैदान में इस बार कई महारथी नहीं हैं। मजबूरियां ऐसी रहीं कि इन्हें दंगल में उतरने का मौका नहीं मिला। इनमें सबसे बड़ा नाम है कांग्रेस के अमरचंद का। वह 1977 से बाह सीट से पहला चुनाव लड़े। इसके बाद 1980 को छोड़कर 2012 तक नौ बार ताल ठोकी। एक बार जीत का सेहरा बंधा, जबकि दस बार हार का मुंह देखना पड़ा।
अमरचंद 1977 में अपने पहले चुनाव में दूसरे नंबर पर रहे। उन्हें वोट मिले 25288। जीत मिली जनता पार्टी के राजा महेन्द्र रिपुदमन सिंह को। जनता पार्टी की लहर थी। इसके बाद कांग्रेस में विवाद के चलते अमरचंद 1980 का चुनाव नहीं लड़ पाए। उस चुनाव में कांग्रेस आई से भोगी लाल मिश्रा लड़े। उन्हें भी हार मिली। इसके बाद 1985 में अमरचंद ने कांग्रेस के सिंबल पर एक बार फिर ताल ठोक दी।
इस बार विधायक बने। उन्होंने लोकदल के महेश चंद तिवारी को 13 हजार से अधिक वोटों से हराया था। 1989 में राजा अरिदमन सिंह से उनका मुकाबला हुआ। राजा जीत गए। तब से 2012 तक हर चुनाव में दोनों आमने सामने रहे। अरिदमन सिंह सात में से छह चुनाव जीते। सिर्फ 2007 में हार मिली बसपा के मधुसूदन के हाथों। इस बार अमरचंद मैदान में नहीं हैं। गठबंधन के चलते सीट सपा के खाते में चली गई।
--। सात बार हुआ अरिदमन से मुकाबला
आगरा ।
अमरचंद के नौ चुनावों में उनका सात बार मुकाबला राजा अरिदमन सिंह से हुआ। 1989 के बाद यह पहला मौका है जब दोनों आमने सामने नहीं है। दोनों के मुकाबले पर जिले भर की नजर रहती थी। अरिदमन ने दल बदले लेकिन अमरचंद कांग्रेस में ही रहे।
--। छोटे लाल की भी नहीं गली दाल
आगरा।
फतेहाबाद सीट पर छोटे लाल वर्मा 1993 से 2012 तक हर चुनाव लड़े । तीन बार विधायक रहे। दो बार भाजपा के टिकट पर। एक बार बसपा के। इस बार चुनाव से ऐन पहले बसपा छोड़कर भाजपा में शामिल हुए। लेकिन टिकट नहीं मिला। 19 साल बाद वह मैदान में नहीं है।