हबीबुल्लाह खान के लिए आगरा को दुल्हन की तरह सजाया गया था। सर जे डी ला टॉच व्यवस्था प्रमुख थे। मिलिट्री बैलून से उन्हें शहर दिखाया गया था। पोलो टूर्नामेंट (वायसराय कप) के वे मुख्य अतिथि भी रहे। ताजमहल के बाद वे आगरा किला पहुंचे। यहां उन्होंने करीब चार घंटे बिताए। 24 हॉर्स पावर की ऑरलींस कार से वे पूरे शहर में घूमे थे। फतेहपुरसीकरी का भी उन्होंने दीदार किया था। शाम को यमुना किनारे जबरदस्त आतिशबाजी भी हुई थी। अंग्रेजों के अलावा महाराजा सिंधिया व उस समय के देश के चोटी के लोगों से उन्होंने आगरा में ही मुलाकात की थी।
इस मुलाकात के पीछे भारत व अफगानिस्तान के बीच व्यापारिक व सामरिक आदान-प्रदान थे। उस समय तमाम सरकारी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर भी हुए थे। आगरा के बाद वे कलकत्ता गए थे। हाल में भी तमाम अफगान नेता भारत और आगरा आते रहे हैं। पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई भी इनमें से एक हैं। पिछले महीने दस जुलाई को अफगानों का 25 सदस्यीय दल आगरा पहुंचा था। करीब डेढ़ घंटे तक उन्होंने फतेहपुरसीकरी में दीवान ए आम, दीवान ए खास, खजाना महल, बीरबल पैलेस, जोधाबाई पैलेस, मरियम पैलेस, अनूप तालाब, चौपड़, पंच महल आदि स्मारकों का दीदार किया था।
चमड़े के काम की हुई थी शुरुआत
ताजनगरी में चमड़े के काम की शुरुआत अफगानों से ही हुई थी। इतिहासकार राज किशोर राजे बताते हैं कि एक जमाने में अफगानिस्तान से उम्दा किस्म की हींग आती थी। मौजूदा हींग की मंडी में ही यह माल उतरता था। हींग को चमड़े के बड़े-बड़े थैलों में लाया जाता था। अफगान व्यापारी हींग के बदले पैसा लेकर यहां से रवाना हो जाते थे, चमड़े के थैले यहीं छोड़ जाते थे। स्थानीय लोग इन थैलों का इस्तेमाल चमड़े की वस्तुएं बनाने में करते थे। धीरे-धीरे आगरा चमड़े का बड़ा केंद्र बन गया।
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