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हिरासत में मौतें: यूपी पुलिस की वर्दी पर 'खून' के दाग

Mon, 20 May 2013 12:06 PM IST
लखनऊ/ब्यूरो
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यूपी में पुलिस हिरासत में निर्दोषों की मौत का सिलसिला बदस्तूर जारी है। कभी पुलिस की पिटाई से अधमरा होकर तो कभी उसकी क्रूरता से दहशत में आकर लोगों की जान चली जाती है।
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यह यूपी ही है जहां कड़ी सुरक्षा में जेल मे निरुद्ध व्यक्ति की भी हत्या कर दी जाती है, भले ही उसे आत्महत्या साबित कर दिया जाए।

सीएमओ डॉ. विनोद आर्य व सीएमओ डॉ. बीपी सिंह की हत्या के आरोप के घेरे में आए डिप्टी सीएमओ डॉ. वाईएस सचान की लखनऊ जेल में मौत इसका प्रमुख उदाहरण है।

कुछ ऐसे ही डॉ. कविता चौधरी हत्याकांड के प्रमुख आरोपी रवींद्र प्रधान उर्फ भूरा की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत होने का मामला है।

लखनऊ में ही बमुश्किल एक माह पहले हसनगंज कोतवाली की हवालात में एक व्यक्ति के पुलिस की थर्ड डिग्री से डर कर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी।

अब पुलिस अभिरक्षा में कचहरी सीरियल ब्लास्ट के आरोपी खालिद मुजाहिद की मौत का मामला आला अफसरों के गले की फांस बना हुआ है।

थम नहीं रहा मौत का सिलसिला
हालांकि, खालिद के साथी तारिक कासमी ने यह बयान दिया था खालिद का स्वास्थ्य सही नहीं था और उसने लखनऊ जेल से चलने से पहले डॉक्टरों से इसकी शिकायत भी की थी पर उसकी सुनवाई नहीं हुई।

लेकिन उसकी पैरवी करने वालों का यह भी कहना था कि खालिद एकदम सही था और कोई षड्यंत्र कर उसे जान से मार दिया गया। बहरहाल, प्रदेश में पुलिस हिरासत में मौत होने का सिलसिला थम नहीं रहा है।
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पिछले छह महीनों में ही लखनऊ में एक, एटा में एक, आगरा में दो, गाजियाबाद में पांच और प्रतापगढ़ में दो लोगों की पुलिस हिरासत में मौत हो चुकी है।

इसमें नवंबर 2012 में एटा के गांव इसौली में गत दिनों हुई मानिकचंद्र की हत्या के मामले में अवागढ़ पुलिस ने मृतक के भाई महेश के दोस्त बलवीर सहित चार लोगों को गिरफ्तार किया था। बलवीर के साथ पुलिस ने थर्ड डिग्री का इस्तेमाल किया, जिससे उसकी हालत बिगड़ गई थी। उसे जिला अस्पताल से आगरा रेफर किया था, वहां से उसे लखनऊ उपचार के लिए भेजा गया था, लेकिन वह बच नहीं सका।

मौत पर बवाल
आगरा के थाना सदर में मैरिज होम से कंगन चोरी के शक में जूता कारीगर धरम सिंह को पुलिस ने पकड़ कर थर्ड डिग्री दी थी। पूछताछ के दौरान टार्चर से उसकी हालत बिगड़ गई। पुलिस उसे मृत अवस्था में जिला अस्पताल लाई। यहां उसकी मौत पर जमकर बवाल हुआ।

ऐसे ही 21 सितंबर 2012 को तुलसी चबूतरा, ताजगंज निवासी 24 वर्षीय रामू का शव धांधूपुरा में खेत में पड़ा मिला था। उसके भाई पप्पू ने पुलिस के सिपाहियों पर मारपीट का आरोप लगाया था।

गाजियाबाद में पुलिस अभिरक्षा और हवालातों में तो 1991 से लेकर अब तक दस से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। लेकिन पिछले छह महीनों में यहां अभिरक्षा में पांच की मौत हुई।

28 अप्रैल 2013 को इंदिरापुरम थाने की हवालात में युवक की लाश लटकी मिली थी तो 12 जुलाई 2012 सीबीआई कस्टडी में वारंटी की मौत हुई।

ऐसे ही 7 जून 2012 को मुरादनगर की वर्धमानपुरम चौकी में पुलिस अभिरक्षा के दौरान प्रेमी युगल ने आत्महत्या कर ली थी। जबकि 13 जून 2012 को विजयनगर थाने में वारंटी की पुलिस अभिरक्षा में मौत हुई थी।

प्रतापगढ़ में कुल 18 दिन पहले एक महिला की हिरासत में मौत हुई। इस पर जमकर बवाल मचा था। रानीगंज थाना क्षेत्र के नजियापुर गांव की रहने वाली तीस वर्षीय हेमा 30 अप्रैल को पुलिस पकड़ कर ले गई थी। हेमा पर आरोप था कि उसने अपने पड़ोसी से मारपीट की।
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उसे पड़ोस के हरिहर पांडेय पर हमले के मामले में पुलिस ने हिरासत में लिया था। हिरासत में पुलिस की सख्ती से उसकी मौत हो गई।

उधर कौशांबी में पुलिसकर्मियों ने ही एक अन्य पुलिसकर्मी की पीट-पीट कर जान ले ली। यह घटना मई 2011 में हुई थी।
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