आम आदमी पार्टी (आप) को दिल्ली में बिजली सस्ती करने का फार्मूला मिल गया है।
उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत परिषद से जुड़े कुछ अभियंतायों ने जो फार्मूला आप को दिया है, उसे लागू किया जा सका तो दिल्ली में चार से साढ़े चार रुपये प्रति यूनिट बिजली मिल सकेगी। केजरीवाल के बुलावे पर दिल्ली गए राज्य विद्युत परिषद संघ के उपाध्यक्ष मोहम्मद फिरोज और ऑल इंडिया पॉ़वर इंजीनियर फेडरेशन के महासचिव शैलेंद्र दुबे ने कई ऐसे रास्ते सुझाए हैं जिस पर चलकर दिल्ली को आधे दर पर बिजली मुहैय्या कराई जा सकती है।
यूपी के तकनीकी विशेषज्ञों की अरविंद केजरीवाल के साथ बैठक पिछले हफ्ते दिल्ली में हुई। बैठक में शामिल हुए मोहम्मद फिरोज ने बताया कि तमाम गुणा-गणित के बाद जो परिणाम सामने आए हैं, उस हिसाब से दिल्ली वालों को आसानी से आधे रेट पर बिजली दी जा सकती है।
दिल्ली में एक यूनिट बिजली के लिए औसतन साढ़े आठ रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं जबकि नए फार्मूले पर काम करने से यह खर्च घटकर चार से साढ़े चार रुपये प्रति यूनिट हो जाएगा।
दिल्ली में वर्तमान में बिजली का रेट सात से 11 रुपये यूनिट है। दिल्ली की तुलना उत्तर प्रदेश (यूपी) से की जाए तो यूपी सरकार हाइड्रो यानी पानी से बनने वाली बिजली 53 पैसे प्रति यूनिट की दर से खरीदती है जबकि दिल्ली सरकार को भाखड़ा नांगल डैम से हाइड्रो बिजली 30 पैसे प्रति यूनिट मिलती है।
यूपी में ओबरा, अनपरा, पनकी थर्मल पावर स्टेशन जैसे उत्पादन निगमों से 2.35 रुपये यूनिट बिजली खरीदी जाती है जबकि दिल्ली को हर स्टेट के पूल के तहत 2.19 रुपये में बिजली मिलती है। इसके अलावा नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन (एनटीपीसी), जो कि केंद्र सरकार का है, यूपी में उसे स्थान, कोयला समेत अन्य सुविधाएं देने के कारण प्रदेश को 3.20 रुपये प्रति यूनिट बिजली मिलती है जबकि दिल्ली को एनटीपीसी से 2.35 रुपये यूनिट बिजली मिल रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यूपी में प्राइवेट कंपनियों से साढ़े पांच से छह रुपये यूनिट बिजली खरीदी जाती है। वहीं, दिल्ली में साढ़े सात से साढे़ आठ रुपये यूनिट बिजली खरीदी जा रही है। यूपी में कुल 13 हजार मेगावाट बिजली की डिमांड है जबकि विभिन्न सरकारी स्नोतों से आठ हजार मेगावाट और प्राइवेट कंपनियों से दो हजार मेगावाट बिजली खरीदी जा रही है।
तीन हजार मेगावाट की भरपाई कटौती करके होती है। वहीं, दिल्ली में डिमांड साढ़े पांच से छह हजार मेगावाट बिजली की है जबकि सरकारी पूल से ही दिल्ली को साढ़े आठ हजार मेगावाट बिजली मिलती है। बिजली डिमांड से ज्यादा मिल रही है तो प्राइवेट कंपनियों से बिजली खरीदने की क्या जरूरत। इसके बावजूद तीन हजार मेगावाट की खरीद प्राइवेट कंपनियों से दिखाई जा रही है।
इंजीनियर मोहम्मद फिरोज का कहना है कि पूरा खेल इसी में हो रहा है। दिल्ली में जो कंपनी वितरण व्यवस्था देख रही है, उसकी कुछ उत्पादन इकाइयां भी हैं। ट्रांसफार्मर आदि वह अपनी इकाइयों से खरीदती है। 100 का सामान 75 रुपये में पड़ता है लेकिन खरीद 300 रुपये में दिखाई जाती है।
प्राइवेट कंपनियों से बिजली खरीद और महंगे उपकरण पर जो खर्च दिखाया जाता है, उसकी वसूली आम जनता से की जाती है और इसी वजह से बिजली महंगी हो गई है। अगर प्राइवेट कंपनियों से बिजली खरीद बंद कर दी जाए और उपकरण सरकार सीधे अपने स्नोतों से खरीदे तो बिजली की कीमत घटकर 3.95 रुपये प्रति यूनिट हो जाएगी। अगर जनता को यह बिजली 4.65 रुपये प्रति यूनिट की दर से भी दी जाए तो आय बढ़ेगी और बिजली की कीमत आधी हो जाएगी।
विशेषज्ञों की आप को सलाह
-दिल्ली को सरकारी स्नोतों से डिमांड से ज्यादा बिजली मिल रही है। ऐसे में प्राइवेट कंपनियों से बिजली खरीद बंद कर दी जाए।
-मेंटनेंस के लिए सभी उपकरण सरकार सीधे अपने स्नोतों से खरीदे।
-पूर्व में निजी स्नोतों से हुई बिजली खरीद से संबंधित एकाउंट की जांच कराई जाए ताकि यह मालूम किया जा सके कि प्राइवेट स्नोतों से बिजली खरीद रोकने पर घाटा कितना कम होगा और जो फायदा होगा, उसका उपयोग किस तरह बिजली व्यवस्था के सुधार के लिए किया जाए।