सधी हुई आवाज में दादरा सुनते पैर ठिठक-से जाते हैं। तबले की थाप भी ध्यान खींचने वाली है। एक बार यह भ्रम होता है कि कहीं रेडियो या टेप तो नहीं बज रहा है। पर नहीं, ये एक गांव है, जहां कदम-कदम पर संगीत बहता है।
आजमगढ़ से चार किलोमीटर दूर आम-महुआ के पेड़ों से घिरे हरिहरपुर गांव में संगीत की सुर लहरियां देख थोड़ा अचंभित होता हूं। कानों में फिर ऐसी आवाज पड़ती है कि कदम रोकने ही पड़ते हैं।
बगल के एक घर में 16-17 साल का लड़का रजनीश एक भजन गा रहा है, हारमोनियम पर संगत दे रहे हैं उनके पिता वीरेंद्र मिश्र। बाहर चौबारे में खाट पर बैठे बाबा पन्नालाल मिश्र बीच में टोकते हैं, जरा कम खींचो, राग बिगड़ रहा है।
65 साल के पन्नालाल खुद भी सिद्धहस्त सारंगी वादक रहे हैं। दरअसल यह एक-दो घर की कहानी नहीं, बल्कि हरिहरपुर गांव के पूरे मिसराने (मिश्र लोगों का मोहल्ला) का हाल ऐसा ही है।
गांव में करीब 350 परिवार हैं। इनमें मिश्र लोगों के 35-40 परिवार हैं। पौ फटने के साथ इन सभी घरों से सारेगामा की ध्वनि निकलती है। शायद ही कोई घर हो जिसके यहां तबला, हारमोनियम या सारंगी न हो।
खेतों में, कुएं पर और जाडे़ में अलाव किनारे की बतकहियों में संगीत ही केंद्र में होता है। पर अपवाद छोड़ परिवार की लड़कियों को संगीत के लिए न प्रोत्साहित किया जाता है न ही वे सीखती हैं।
इसी 4 से 6 अप्रैल के बीच दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में गांव के छोटे-छोटे बच्चों ने अपना हुनर दिखाया तो बड़े-बड़े लोगों ने दांतों तले उंगली दबा ली थी।
आजमगढ़ के अग्रसेन कन्या इंटर कालेज में संगीत के शिक्षक रहे शंभूनाथ मिश्रा बताते हैं कि गांव में संगीत की परंपरा 600 साल पुरानी है। गांव की माटी और हमारी रगों में संगीत ही है।
न कोई प्रशिक्षण न कोई गुरुपर गांव के बच्चे कम उम्र में ही गाने-बजाने में पारंगत हो जाते हैं। जाने-अनजाने पिता, चाचा, बाबा ही उनके गुरु बन जाते हैं।