लखनऊ। लखनऊ मैनेजमेंट एसोसिएशन ने गुरुवार को उत्तराखंड की प्राकृतिक आपदा पर एक व्याख्यान का आयोजन किया। इसमें हिमालयन रिसर्च इंस्टीट्यूट के चीफ कंसल्टेंट दीपक श्रीवास्तव ने 1882 और 2013 केदारनाथ की तुलना करते हुए बताया कि यह आपदा क्यों आई। व्याख्यान में एलएमए पदाधिकारी और दूसरे लोग मौजूद थे।
अपने व्याख्यान में दीपक श्रीवास्तव ने 1882 में किसी अंग्रेज फोटोग्राफर द्वारा ली गई एक तस्वीर साझा की जिसमें दिखाया कि किस तरह उस दौरान पवित्र मंदिर के आस-पास सिर्फ 10-12 झोंपड़ियां ही थीं। जो बताती है कि यहां तीर्थ यात्री बस इन्हीं का उपयोग करते थे और उनके जाने पर दूसरे इनमें रहते होंगे। साथ ही उन्हाेंने 2013 की तस्वीर के जरिए बताया कि किस तरह पूरा क्षेत्र होटलों से भर गया था। कई इमारतों को 2 मंजिल बनाने की अनुमति थी तो वहां 4 मंजिलें बना दी गईं। भागीरथी का यह किनारा एक पिकनिक स्थल हो गया जहां कई लोग ऐशो आराम करने, ग्लेश्यिर देखने और बर्फबारी देखने आने लगे थे। यह क्षेत्र रहने के लिए नहीं था, लेकिन यहां कोई रोकटोक नहीं की गई। लखनऊ जीएसआई में डिप्टी डायरेक्टर रह चुके श्रीवास्तव ने बताया कि हज या वैष्णोदेवी मंदिर जाने पर भी लोगों पर नियंत्रण है, लेकिन केदारनाथ के लिए कभी ऐसा सोचा ही नहीं गया। यहां आने के लिए 4 अलग-अलग रास्ते हैं और लोग बेरोकटोक आते हैं। जिससे क्षेत्र मानवीय गतिविधियों से भर गया है। इन हालात में जब आपदा आई तो उसने बहुत बड़ा नुकसान किया। दूसरी ओर सरकार ने बहुत धीरे प्रतिक्रिया दी। थलसेना और वायुसेना ने बहुत तेज और अच्छा काम किया, लेकिन इतनी बड़ी संख्या में लोग फंसे हुए थे कि नुकसान भी उसी अनुपात में हुआ है। उन्हाेंने बताया कि भविष्य में ऐसे हालात न हों, इसके लिए जरूरी है कि यहां निर्माण पर नियंत्रण हो, लोगों के आने जाने पर नियंत्रण हो और प्रकृति को सहेजने पर प्राथमिकता दी जाए। कार्यक्रम में एलएमए के पदाधिकारी आरके मित्तल, मधुसूदन गुलाटी, एके माथुर, सुनील अग्रवाल और कई गणमान्य नागरिक जिनमें एसडी वर्मा, आसमां हुसैन, सुधीर हलवासिया, अवधबिहारी लाल, आदि मौजूद थे।