लखनऊ। ‘थाने आने से पहले व्यक्ति हजार बार सोचकर आता है कहीं शिकायत सुने जाने के बजाय उसी के साथ कुछ गलत न हो जाए। इससे पता चलता है कि लोगों के बीच पुलिस की छवि कैसी हो चली है।’ पब्लिक में पुलिस की छवि का यह आईना एसएसपी जे रविंदर गौड ने उन पुलिसकर्मियों को दिखाया जो थाने में लोगों की शिकायतें सुनने के लिए बैठाए गए हैं। मौका था ‘पब्लिक ग्रीवांस और पुलिस रिस्पांस’ विषय पर पुलिस लाइन में रविवार को आयोजित वर्कशॉप का। इसमें लखनऊ के 43 थानों में बनाई गई सहायता डेस्क पर तैनात पुलिसकर्मी व अन्य अधिकारी शामिल हुए।
वर्कशॉप में पुलिसकर्मियों को फरियादियों से बेहतर व्यवहार करने और उनकी बात को सहानुभूतिपूर्वक सुनने के लिए प्रेरित किया गया। यहां पुलिस अधिकारियों के अलावा मनोचिकित्सक, आयोजन के सहयोगियों सहित खुद पुलिसकर्मियों ने भी अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि लोगों के बीच बेहतर छवि के लिए किस तरह काम करने की जरूरत है। डॉ. अर्चना ने समझाया कि जब पीड़ित थाने आते हैं तो उनके मन में अपनी पीड़ा किसी ऐसे व्यक्ति से साझा करने का ख्याल ज्यादा होता है जो उसका समाधान कर सके। ऐसे में पुलिस अगर उन्हें बिना बात सुने भगा देगी तो पूरे पुलिस सिस्टम के प्रति उनके मन में सम्मान कम होगा। वर्कशॉप में कैंट सीओ बबिता सिंह, अपर पुलिस अधीक्षक प्रोटोकॉल ज्ञानप्रकाश चतुर्वेदी, एडीएम चतुर्थ रामकुमार गौतम और शिकायत प्रकोष्ठ प्रभारी अतुल अग्निहोत्री भी उपस्थित थे।
दुराचार पीड़िताओं-परिवारों को देंगे काउंसलिंग
एसएसपी जे रविंदर गौड ने राजधानी में दुराचार की लगातार बढ़ रही घटनाओं पर कहा कि पुलिस जल्द ही विशेष टीम का गठन करेगी। इसमें क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट, सामाजिक कार्यकर्ता, महिला एक्टिविस्ट्स सहित पुलिस विभाग के भी लोग होंगे। यह टीम दुराचार पीड़िताओं के परिवारों को काउंसलिंग व मानसिक मजबूती के लिए मार्गदर्शन उपलब्ध करवाएगी।
...वरना हद पार कर सकता है जनता का आक्रोश
एसएसपी ने पुलिस की कार्यशैली को पुलिसकर्मियों के बीच ही रखकर उन्हें झिंझोड़ा। इस दौरान उन्होंने कड़े शब्दों में पुलिस के मौजूदा रवैए की आलोचना करते हुए इनमें बदलाव लाने को कहा।
- आप देखते हैं जो व्यक्ति थाने आया है वो आपकी ‘सेवा’ कर सकता है या नहीं। अगर उसमें ‘लक्ष्मी’ का रूप दिखता है, तभी आप उसकी सेवा करते हैं, जबकि आपने पुलिस की नौकरी सभी की सेवा के लिए की है, खास-खास की सेवा के लिए नहीं।
- महिलाओं को देखकर आप कैसी टिप्पणियां करते हैं, हमें मालूम है। महिला पुलिसकर्मी चाहें तो खुद बिना वर्दी के थानों में जाकर इसे महसूस कर सकती हैं। इसे सुधारिए, जनता में पुलिस के प्रति आक्रोश बढ़ रहा है। समय रहते इसे भांपिए।
- थाने आए गरीबों से आप कैसा व्यवहार करते हैं, बताने की जरूरत नहीं। उनकी बात तक आप नहीं सुनते, मामले क्या सुलझाएंगे। कई बार मैं अपने पास आई उनकी शिकायतें संबंधित थानों में ‘कृपया सुनवाई करें’ की नोटिंग डालकर भेजता हूं। कम से उनकी सुनवाई तो करो।
- जनता को लगने लगा है कि पुलिस लूटने, डराने, प्रताड़ित करने के लिए है, सेवा के लिए नहीं। अपनी वाणी और व्यवहार पर नियंत्रण रखकर काम कीजिए वरना जनता का आक्रोश हद पार कर सकता है।
‘साब’ होने का रवैया छोड़ बनें मददगार
- शिकायत करने वाले से उस मेहमान की तरह व्यवहार करें जो आपके घर आया हो। कार्यस्थल भी आपका घर ही है।
- शिकायत सुनने से पहले फरियादी को पानी पिलाइए, उसे अहसास करवाइए कि उसके साथ जो गलत हुआ है, पुलिस उसे सुधारेगी, उसकी मदद करेगी।
- ‘साब’ होने का रवैया छोड़ दीजिए, आपको सिस्टम ने मौका दिया है कि जरूरतमंदों की मदद कर सकें, उसे पूरा कीजिए।
- फरियादी से मिली शिकायती पीली पर्ची पर 24 घंटे में कार्यवाही शुरू कीजिए।